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Thursday, 25 September 2014

औरंगजेब मुगल बादशाह द्वारा बाला जी मंदिर को दी गयी जमीन

औरंगज़ेब ने मन्दिर तोड़ा तो मस्जिद भी तोड़ी लेकिन क्यूं?

तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना।
कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।

पुस्‍तक: ‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘
लेखक: प्रो. बी. एन पाण्डेय, भूतपूर्व राज्यपाल उडीसा, राज्यसभा के सदस्य, इलाहाबाद नगरपालिका के चेयरमैन एवं इतिहासकार

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जब में इलाहाबाद नगरपालिका का चेयरमैन था (1948 ई. से 1953 ई. तक) तो मेरे सामने दाखिल-खारिज का एक मामला लाया गया। यह मामला सोमेश्वर नाथ महादेव मन्दिर से संबंधित जायदाद के बारे में था। मन्दिर के महंत की मृत्यु के बाद उस जायदाद के दो दावेदार खड़े हो गए थे। एक दावेदार ने कुछ दस्तावेज़ दाखिल किये जो उसके खानदान में बहुत दिनों से चले आ रहे थे। इन दस्तावेज़ों में शहंशाह औरंगज़ेब के फ़रमान भी थे। औरंगज़ेब ने इस मन्दिर को जागीर और नक़द अनुदान दिया था। मैंने सोचा कि ये फ़रमान जाली होंगे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसे हो सकता है कि औरंगज़ेब जो मन्दिरों को तोडने के लिए प्रसिद्ध है, वह एक मन्दिर को यह कह कर जागीर दे सकता हे यह जागीर पूजा और भोग के लिए दी जा रही है। आखि़र औरंगज़ेब कैस बुतपरस्ती के साथ अपने को शरीक कर सकता था। मुझे यक़ीन था कि ये दस्तावेज़ जाली हैं, परन्तु कोई निर्णय लेने से पहले मैंने डा. सर तेज बहादुर सप्रु से राय लेना उचित समझा। वे अरबी और फ़ारसी के अच्छे जानकार थे। मैंने दस्तावेज़ें उनके सामने पेश करके उनकी राय मालूम की तो उन्होंने दस्तावेज़ों का अध्ययन करने के बाद कहा कि औरंगजे़ब के ये फ़रमान असली और वास्तविक हैं। इसके बाद उन्होंने अपने मुन्शी से बनारस के जंगमबाडी शिव मन्दिर की फ़ाइल लाने को कहा। यह मुक़दमा इलाहाबाद हाईकोर्ट में 15 साल से विचाराधीन था। जंगमबाड़ी मन्दिर के महंत के पास भी औरंगज़ेब के कई फ़रमान थे, जिनमें मन्दिर को जागीर दी गई थी।

इन दस्तावेज़ों ने औरंगज़ेब की एक नई तस्वीर मेरे सामने पेश की, उससे मैं आश्चर्य में पड़ गया। डाक्टर सप्रू की सलाह पर मैंने भारत के पिभिन्न प्रमुख मन्दिरों के महंतो के पास पत्र भेजकर उनसे निवेदन किया कि यदि उनके पास औरंगज़ेब के कुछ फ़रमान हों जिनमें उन मन्दिरों को जागीरें दी गई हों तो वे कृपा करके उनकी फोटो-स्टेट कापियां मेरे पास भेज दें। अब मेरे सामने एक और आश्चर्य की बात आई। उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर, चित्रकूट के बालाजी मन्दिर, गौहाटी के उमानन्द मन्दिर, शत्रुन्जाई के जैन मन्दिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मन्दिरों एवं गुरूद्वारों से सम्बन्धित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की नक़लें मुझे प्राप्त हुई। यह फ़रमान 1065 हि. से 1091 हि., अर्थात 1659 से 1685 ई. के बीच जारी किए गए थे। हालांकि हिन्दुओं और उनके मन्दिरों के प्रति औरंगज़ेब के उदार रवैये की ये कुछ मिसालें हैं, फिर भी इनसे यह प्रमाण्ति हो जाता है कि इतिहासकारों ने उसके सम्बन्ध में जो कुछ लिखा है, वह पक्षपात पर आधारित है और इससे उसकी तस्वीर का एक ही रूख सामने लाया गया है। भारत एक विशाल देश है, जिसमें हज़ारों मन्दिर चारों ओर फैले हुए हैं। यदि सही ढ़ंग से खोजबीन की जाए तो मुझे विश्वास है कि और बहुत-से ऐसे उदाहरण मिल जाऐंगे जिनसे औरंगज़ेब का गै़र-मुस्लिमों के प्रति उदार व्यवहार का पता चलेगा। औरंगज़ेब के फरमानों की जांच-पड़ताल के सिलसिले में मेरा सम्पर्क श्री ज्ञानचंद और पटना म्यूजियम के भूतपूर्व क्यूरेटर डा. पी एल. गुप्ता से हुआ। ये महानुभाव भी औरंगज़ेब के विषय में ऐतिहासिक दृस्टि से अति महत्वपूर्ण रिसर्च कर रहे थे। मुझे खुशी हुई कि कुछ अन्य अनुसन्धानकर्ता भी सच्चाई को तलाश करने में व्यस्त हैं और काफ़ी बदनाम औरंगज़ेब की तस्वीर को साफ़ करने में अपना योगदान दे रहे हैं। औरंगज़ेब, जिसे पक्षपाती इतिहासकारों ने भारत में मुस्लिम हकूमत का प्रतीक मान रखा है। उसके बारें में वे क्या विचार रखते हैं इसके विषय में यहां तक कि ‘शिबली’ जैसे इतिहास गवेषी कवि को कहना पड़ाः

तुम्हें ले-दे के सारी दास्तां में याद है इतना।
कि औरंगज़ेब हिन्दू-कुश था, ज़ालिम था, सितमगर था।।

औरंगज़ेब पर हिन्दू-दुश्मनी के आरोप के सम्बन्ध में जिस फरमान को बहुत उछाला गया है, वह ‘फ़रमाने-बनारस’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह फ़रमान बनारस के मुहल्ला गौरी के एक ब्राहमण परिवार से संबंधित है। 1905 ई. में इसे गोपी उपाघ्याय के नवासे मंगल पाण्डेय ने सिटि मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया था। एसे पहली बार ‘एसियाटिक- सोसाइटी’ बंगाल के जर्नल (पत्रिका) ने 1911 ई. में प्रकाशित किया था। फलस्वरूप रिसर्च करनेवालों का ध्यान इधर गया। तब से इतिहासकार प्रायः इसका हवाला देते आ रहे हैं और वे इसके आधार पर औरंगज़ेब पर आरोप लगाते हैं कि उसने हिन्दू मन्दिरों के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया था, जबकि इस फ़रमान का वास्तविक महत्व उनकी निगाहों से आझल रह जाता है। यह लिखित फ़रमान औरंगज़ेब ने 15 जुमादुल-अव्वल 1065 हि. (10 मार्च 1659 ई.) को बनारस के स्थानिय अधिकारी के नाम भेजा था जो एक ब्राहम्ण की शिकायत के सिलसिले में जारी किया गया था। वह ब्राहमण एक मन्दिर का महंत था और कुछ लोग उसे परेशान कर रहे थे। फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘अबुल हसन को हमारी शाही उदारता का क़ायल रहते हुए यह जानना चाहिए कि हमारी स्वाभाविक दयालुता और प्राकृतिक न्याय के अनुसार हमारा सारा अनथक संघर्ष और न्यायप्रिय इरादों का उद्देश्य जन-कल्याण को बढ़ावा देना है और प्रत्येक उच्च एवं निम्न वर्गों के हालात को बेहतर बनाना है। अपने पवित्र कानून के अनुसार हमने फैसला किया है कि प्राचीन मन्दिरों को तबाह और बर्बाद नहीं किया जाएँ, अलबत्ता नए मन्दिर न बनए जाएँ। हमारे इस न्याय पर आधारित काल में हमारे प्रतिष्ठित एवं पवित्र दरबार में यह सूचना पहुंची है कि कुछ लोग बनारस शहर और उसके आस-पास के हिन्दू नागरिकों और मन्दिरों के ब्राहम्णों-पुरोहितों को परेशान कर रहे हैं तथा उनके मामलों में दख़ल दे रहे हैं, जबकि ये प्राचीन मन्दिर उन्हीं की देख-रेख में हैं। इसके अतिरिक्त वे चाहते हैं कि इन ब्राहम्णों को इनके पुराने पदों से हटा दें। यह दखलंदाज़ी इस समुदाय के लिए परेशानी का कारण है। इसलिए यह हमारा फ़रमान है कि हमारा शाही हुक्म पहुंचते ही तुम हिदायत जारी कर दो कि कोई भी व्यक्ति ग़ैर-कानूनी रूप से दखलंदाजी न करे और न उन स्थानों के ब्राहम्णों एवं अन्य हिन्दु नागरिकों को परेशान करे। ताकि पहले की तरह उनका क़ब्ज़ा बरक़रार रहे और पूरे मनोयोग से वे हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के लिए प्रार्थना करते रहें। इस हुक्म को तुरन्त लागू किया जाये।’’

इस फरमान से बिल्कुल स्पष्ट हैं कि औरंगज़ेब ने नए मन्दिरों के निर्माण के विरूद्ध कोई नया हुक्म जारी नहीं किया, बल्कि उसने केवल पहले से चली आ रही परम्परा का हवाला दिया और उस परम्परा की पाबन्दी पर ज़ोर दिया। पहले से मौजूद मन्दिरों को ध्वस्त करने का उसने कठोरता से विरोध किया। इस फ़रमान से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह हिन्दू प्रजा को सुख-शान्ति से जीवन व्यतीत करने का अवसर देने का इच्छुक था। यह अपने जैसा केवल एक ही फरमान नहीं है। बनारस में ही एक और फरमान मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब वास्तव में चाहता था कि हिन्दू सुख-शान्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सकें। यह फरमान इस प्रकार हैः ‘‘रामनगर (बनारस) के महाराजाधिराज राजा रामसिंह ने हमारे दरबार में अर्ज़ी पेश की हैं कि उनके पिता ने गंगा नदी के किनारे अपने धार्मिक गुरू भगवत गोसाईं के निवास के लिए एक मकान बनवाया था। अब कुछ लोग गोसाईं को परेशान कर रहे हैं। अतः यह शाही फ़रमान जारी किया जाता है कि इस फरमान के पहुंचते ही सभी वर्तमान एवं आने वाले अधिकारी इस बात का पूरा ध्यान रखें कि कोई भी व्यक्ति गोसाईं को परेशान एवं डरा-धमका न सके, और न उनके मामलें में हस्तक्षेप करे, ताकि वे पूरे मनोयोग के साथ हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए प्रार्थना करते रहें। इस फरमान पर तुरं अमल गिया जाए।’’ (तीरीख-17 बबी उस्सानी 1091 हिजरी) जंगमबाड़ी मठ के महंत के पास मौजूद कुछ फरमानों से पता चलता है कि

औरंगज़ैब कभी यह सहन नहीं करता था कि उसकी प्रजा के अधिकार किसी प्रकार से भी छीने जाएँ, चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान। वह अपराधियों के साथ सख़्ती से पेश आता था। इन फरमानों में एक जंगम लोंगों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) की ओर से एक मुसलमान नागरिक के दरबार में लाया गया, जिस पर शाही हुक्म दिया गया कि बनारस सूबा इलाहाबाद के अफ़सरों को सूचित किया जाता है कि पुराना बनारस के नागरिकों अर्जुनमल और जंगमियों ने शिकायत की है कि बनारस के एक नागरिक नज़ीर बेग ने क़स्बा बनारस में उनकी पांच हवेलियों पर क़ब्जा कर लिया है। उन्हें हुक्म दिया जाता है कि यदि शिकायत सच्ची पाई जाए और जायदा की मिल्कियत का अधिकार प्रमानिण हो जाए तो नज़ीर बेग को उन हवेलियों में दाखि़ल न होने दया जाए, ताकि जंगमियों को भविष्य में अपनी शिकायत दूर करवाने के लिएए हमारे दरबार में ने आना पडे। इस फ़रमान पर 11 शाबान, 13 जुलूस (1672 ई.) की तारीख़ दर्ज है। इसी मठ के पास मौजूद एक-दूसरे फ़रमान में जिस पर पहली नबीउल-अव्वल 1078 हि. की तारीख दर्ज़ है, यह उल्लेख है कि ज़मीन का क़ब्ज़ा जंगमियों को दया गया। फ़रमान में है- ‘‘परगना हवेली बनारस के सभी वर्तमान और भावी जागीरदारों एवं करोडियों को सूचित किया जाता है कि शहंशाह के हुक्म से 178 बीघा ज़मीन जंगमियों (शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) को दी गई। पुराने अफसरों ने इसकी पुष्टि की थी और उस समय के परगना के मालिक की मुहर के साथ यह सबूत पेश किया है कि ज़मीन पर उन्हीं का हक़ है। अतः शहंशाह की जान के सदक़े के रूप में यह ज़मीन उन्हें दे दी गई। ख़रीफ की फसल के प्रारम्भ से ज़मीन पर उनका क़ब्ज़ा बहाल किया जाय और फिर किसीप्रकार की दखलंदाज़ी न होने दी जाए, ताकि जंगमी लोग(शैव सम्प्रदाय के एक मत के लोग) उसकी आमदनी से अपने देख-रेख कर सकें।’’ इस फ़रमान से केवल यही ता नहीं चलता कि औरंगज़ेब स्वभाव से न्यायप्रिय था, बल्कि यह भी साफ़ नज़र आता है कि वह इस तरह की जायदादों के बंटवारे में हिन्दू धार्मिक सेवकों के साथ कोई भेदभाव नहीं बरता था। जंगमियों को 178 बीघा ज़मीन संभवतः स्वयं औरंगज़ेब ही ने प्रदान की थी, क्योंकि एक दूसरे फ़रमान (तिथि 5 रमज़ान, 1071 हि.) में इसका स्पष्टीकरण किया गया है कि यह ज़मीन मालगुज़ारी मुक्त है।

औरंगज़ेब ने एक दूसरे फरमान (1098 हि.) के द्वारा एक-दूसरी हिन्दू धार्मिक संस्था को भी जागीर प्रदान की। फ़रमान में कहा गया हैः ‘‘बनारस में गंगा नदी के किनारे बेनी-माधो घाट पर दो प्लाट खाली हैं एक मर्क़जी मस्जिद के किनारे रामजीवन गोसाईं के घर के सामने और दूसरा उससे पहले। ये प्लाट बैतुल-माल की मिल्कियत है। हमने यह प्लाट रामजीवन गोसाईं और उनके लड़के को ‘इनाम’ के रूप में प्रदान किया, ताकि उक्त प्लाटों पर बाहम्णें एवं फ़क़ीरों के लिए रिहायशी मकान बनाने के बाद वे खुदा की इबादत और हमारी ईश-प्रदत्त सल्तनत के स्थायित्व के लिए दूआ और प्रार्थना कने में लग जाएं। हमारे बेटों, वज़ीरों, अमीरों, उच्च पदाधिकारियों, दरोग़ा और वर्तमान एवं भावी कोतवालों के अनिवार्य है कि वे इस आदेश के पालन का ध्यान रखें और उक्त प्लाट, उपर्युक्त व्यक्ति और उसके वारिसों के क़ब्ज़े ही मे रहने दें और उनसे न कोई मालगुज़ारी या टैक्स लिया जसए और न उनसे हर साल नई सनद मांगी जाए।’’ लगता है औरंगज़ेब को अपनी प्रजा की धार्मिक भावनाओं के सम्मान का बहुत अधिक ध्यान रहता था।

हमारे पास औरंगज़ेब का एक फ़रमान (2 सफ़र, 9 जुलूस) है जो असम के शह गोहाटी के उमानन्द मन्दिर के पुजारी सुदामन ब्राहम्ण के नाम है। असम के हिन्दू राजाओं की ओर से इस मन्दिर और उसके पुजारी को ज़मीन का एक टुकड़ा और कुछ जंगलों की आमदनी जागीर के रूप में दी गई थी, ताकि भोग का खर्च पूरा किया जा सके और पुजारी की आजीविका चल सके। जब यह प्रांत औरंगजेब के शासन-क्षेत्र में आया, तो उसने तुरंत ही एक फरमान के द्वारा इस जागीर को यथावत रखने का आदेश दिया। हिन्दुओं और उनके धर्म के साथ औरंगज़ेब की सहिष्ण्ता और उदारता का एक और सबूत उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर के पुजारियों से मिलता है। यह शिवजी के प्रमुख मन्दिरों में से एक है, जहां दिन-रात दीप प्रज्वलित रहता है। इसके लिए काफ़ी दिनों से पतिदिन चार सेर घी वहां की सरकार की ओर से उपलब्ध कराया जाथा था और पुजारी कहते हैं कि यह सिलसिला मुगल काल में भी जारी रहा। औरंगजेब ने भी इस परम्परा का सम्मान किया। इस सिलसिले में पुजारियों के पास दुर्भाग्य से कोई फ़रमान तो उपलब्ध नहीं है, परन्तु एक आदेश की नक़ल ज़रूर है जो औरंगज़ब के काल में शहज़ादा मुराद बख़्श की तरफ से जारी किया गया था। 5 शव्वाल 1061 हि. को यह आदेश शहंशाह की ओर से शहज़ादा ने मन्दिर के पुजारी देव नारायण के एक आवेदन पर जारी किया था। वास्तविकता की पुष्टि के बाद इस आदेश में कहा गया हैं कि मन्दिर के दीप के लिए चबूतरा कोतवाल के तहसीलदार चार सेर अकबरी घी प्रतिदिन के हिसाब से उपल्ब्ध कराएँ। इसकी नक़ल मूल आदेश के जारी होने के 93 साल बाद (1153 हिजरी) में मुहम्मद सअदुल्लाह ने पुनः जारी की। साधारण्तः इतिहासकार इसका बहुत उल्लेख करते हैं कि अहमदाबाद में नागर सेठ के बनवाए हुए चिन्तामणि मन्दिर को ध्वस्त किया गया, परन्तु इस वास्तविकता पर पर्दा डाल देते हैं कि उसी औरंगज़ेब ने उसी नागर सेठ के बनवाए हुए शत्रुन्जया और आबू मन्दिरों को काफ़ी बड़ी जागीरें प्रदान कीं।

मन्दिर तोड़ने की घट्ना

निःसंदेह इतिहास से यह प्रमाण्ति होता हैं कि औरंगजेब ने बनारस के विश्वनाथ मन्दिर और गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद को ढा देने का आदेश दिया था, परन्तु इसका कारण कुछ और ही था। विश्वनाथ मन्दिर के सिलसिले में घटनाक्रम यह बयान किया जाता है कि जब औरंगज़ेब बंगाल जाते हुए बनारस के पास से गुज़र रहा था, तो उसके काफिले में शामिल हिन्दू राजाओं ने बादशाह से निवेदन किया कि वहा। क़ाफ़िला एक दिन ठहर जाए तो उनकी रानियां बनारस जा कर गंगा दनी में स्नान कर लेंगी और विश्वनाथ जी के मन्दिर में श्रद्धा सुमन भी अर्पित कर आएँगी। औरंगज़ेब ने तुरंत ही यह निवेदन स्वीकार कर लिया और क़ाफिले के पडाव से बनारस तक पांच मील के रास्ते पर फ़ौजी पहरा बैठा दिया। रानियां पालकियों में सवार होकर गईं और स्नान एवं पूजा के बाद वापस आ गईं, परन्तु एक रानी (कच्छ की महारानी) वापस नहीं आई, तो उनकी बडी तलाश हुई, लेकिन पता नहीं चल सका। जब औरंगजै़ब को मालूम हुआ तो उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपने फ़ौज के बड़े-बड़े अफ़सरों को तलाश के लिए भेजा। आखिर में उन अफ़सरों ने देखा कि गणेश की मूर्ति जो दीवार में जड़ी हुई है, हिलती है। उन्होंने मूर्ति हटवा कर देख तो तहखाने की सीढी मिली और गुमशुदा रानी उसी में पड़ी रो रही थी। उसकी इज़्ज़त भी लूटी गई थी और उसके आभूषण भी छीन लिए गए थे। यह तहखाना विश्वनाथ जी की मूर्ति के ठीक नीचे था। राजाओं ने इस हरकत पर अपनी नाराज़गी जताई और विरोघ प्रकट किया। चूंकि यह बहुत घिनौना अपराध था, इसलिए उन्होंने कड़ी से कड़ी कार्रवाई कने की मांग की। उनकी मांग पर औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि चूंकि पवित्र-स्थल को अपवित्र किया जा चुका है। अतः विश्नाथ जी की मूर्ति को कहीं और लेजा कर स्थापित कर दिया जाए और मन्दिर को गिरा कर ज़मीन को बराबर कर दिया जाए और महंत को गिरफ्तार कर लिया जाए। डाक्टर पट्ठाभि सीता रमैया ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘द फ़ेदर्स एण्ड द स्टोन्स’ मे इस घटना को दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया है। पटना म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर डा. पी. एल. गुप्ता ने भी इस घटना की पुस्टि की है।

मस्जिद तोड़ने की घटना

गोलकुण्डा की जामा-मस्जिद की घटना यह है कि वहां के राजा जो तानाशाह के नाम से प्रसिद्ध थे, रियासत की मालगुज़ारी वसूल करने के बाद दिल्ली का हिस्सा नहीं भेजते थे। कुछ ही वर्षों में यह रक़म करोड़ों की हो गई। तानाशाह न यह ख़ज़ाना एक जगह ज़मीन में गाड़ कर उस पर मस्जिद बनवा दी। जब औरंज़ेब को इसका पता चला तो उसने आदेश दे दिया कि यह मस्जिद गिरा दी जाए। अतः गड़ा हुआ खज़ाना निकाल कर उसे जन-कल्याण के कामों मकें ख़र्च किया गया। ये दोनों मिसालें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि औरंगज़ेब न्याय के मामले में मन्दिर और मस्जिद में कोई फ़र्क़ नहीं समझता था। ‘‘दर्भाग्य से मध्यकाल और आधुनिक काल के भारतीय इतिहास की घटनाओं एवं चरित्रों को इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर मनगढंत अंदाज़ में पेश किया जाता रहा है कि झूठ ही ईश्वरीय आदेश की सच्चाई की तरह स्वीकार किया जाने लगा, और उन लोगों को दोषी ठहराया जाने लगा जो तथ्य और मनगढंत बातों में अन्तर करते हैं। आज भी साम्प्रदायिक एवं स्वार्थी तत्व इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने और उसे ग़लत रंग देने में लगे हुए हैं।

साभार पुस्तक ‘‘इतिहास के साथ यह अन्याय‘‘ प्रो. बी. एन पाण्डेय, मधुर संदेश संगम, अबुल फज़्ल इन्कलेव, दिल्ली-2

औरंगजेब मुगल बादशाह द्वारा बाला जी मंदिर को दी गयी जमीन के कागज पुजारी मंगलदास जी दिखाते हुए Priest, Mangal Dasji, Balaji Mandir, Ramghat, Chitrakoot For Balaji Temple space allotted by Emperor Aurangzeb!


कुरान में Orbits, Gasseous Mass, Nebula aur Big Bang theory का ज़िक्र:



"सूर्य चन्द्रमा को अपनी ओर खींच नहीं सकता और ना दिन, रात से आगे निकल सकता है. ये सब एक कक्षा (orbit) में अपनी गति के साथ चल रहे है."
- कुरान 36:40

दिन के रात से आगे निकलने के शब्द देखिये, पृथ्वी से ऊंचाई पर जाकर देखा जाये तो इस दृश्य का इन्ही शब्दों में उल्लेख किया जा सकता है की दोनों एक दुसरे का पीछा कर रहे है. इसके अतरिक्त आयत में "यसबाहून" शब्द है जिसका अर्थ है की वो अपनी गति के साथ चल रहे हैं अर्थात आयत में बता दिया गया है की सूर्ये चन्द्रमा और पृथ्वी अपनी-अपनी धुरी (Axis) पर घूम रहे है और इस गति के साथ-साथ अपनी-अपनी कक्षों (Orbits) में भी घूम रहे है. बीसवी शताब्दी में आकर विज्ञान (Science) ने बताया की सूर्य अपनी धुरी (Axis) पर एक चक्कर 25 दिन में पूरा करता है और अपनी कक्षा (Orbits) में 125 मील प्रति सेकंड (7,20,000 प्रति किलोमीटर प्रति घंटे) की गति से चलते हुए एक चक्कर 25 करोड़ वर्ष में पूरा करता है. आधुनिक विज्ञानिक शोध ने अब यह बताया हैं की सूर्य व चन्द्रमा की जीवन अवधि एक दिन समाप्त हो जाएगी और यह की सूर्य एक विशेष दिशा में भी बहा चला जा रहा है. आज विज्ञान ने उस स्थान को निश्चित भी कर दिया है जहा सूर्य जाकर समाप्त होगा. उसे Solar Apex का नाम दिया गया हैं और सूर्य उसकी ओर 12 मील प्रति सेकंड की गति से बढ़ रहा है.
अब ज़रा बीसवी सदी के इन अनुसंधानों को कुरान की दो आयतों में देखे

"क्या तुमने इस पर दृष्टि नहीं डाली की अल्लाह रात को दिन में और दिन को रात में प्रवेश करता है. सूर्य और चन्द्रमा को काम में लगा रखा है. हर एक निश्चित काल तक ही चलेगा (और अल्लाह जब ऐसा सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञानी है तो) अल्लाह तुम्हारे सारे कर्मो की जानकारी भी रखता है."
- कुरान 31:29

इस आयत में एक निश्चित समय तक सूर्य और चन्द्रमा की जीवन का उल्लेख किया गया है और अब सूर्य के एक विशिष्ट स्थान की ओर खिसकने का वर्णन -
"और एक निशानी यह भी है की सूर्य अपने लक्ष्य की और चला जा रहा है. यह एक अथाह ज्ञान वाले (अल्लाह) का निश्चित किया हुआ हिसाब है"
- कुरान 36:38

यह आकाशगंगा, सर मंडल, तथा पृथ्वी व आकाश कैसे उत्पन्न हुए इस सम्बन्ध में कुरान ने संकेत दिया था -
"फिर उसने (अल्लाह ने) ध्यान किया और वो पहले धुंआ (Gasseous Mass) था"
- कुरान 41:41

"क्या इनकार करने वाले नहीं देखते की आकाश और पृथ्वी प्रारंभ में एक थे फिर हमने उन्हें अलग-अलग किया और हर जीव की उत्पत्ति का आधार पानी को बनाया? क्या अब भी वो ईमान नहीं लायेंगे?"
- कुरान 21:30

उपरोक्त दोनों आयते Nebula और विशाल विस्फोट सिध्धांत (big-bang theory) की ओर संकेत करती है. यह भी विशिष्ट रूप से नोट कर लें की इन सब आयतों में ईश्वर ने इनकार करने वालो को ईमान लाने का निर्देश ये कहते हुए दिया हैं की हमारे इन चमत्कारों को देख कर भी तुम क्यों ईमान नहीं लाते. 1400 साल पहले कोई व्यक्ति अपने सामान्य जीवन के अनुभवों पर आधारित साधारण सी कविता के रूप में लोगो के समक्ष प्रस्तुत करता तो उसमे चुनोती न होती की यह साधारण बाते नहीं, वरना ईश्वर का वो महान चमत्कार हैं जिन्हें देख कर तुम्हे ईमान लाना ही चाहिए.

अल्लाह ने कुरान में फ़रमाया है -
"आसमानों और ज़मीन में जो कुछ है, उसे हमने तुम्हारे अधीन कर दिया है और इस तथ्य में उन लोगो के लिए निशानियाँ हैं जो चिंतन करते हैं."
- कुरान 45:13

मैने इस्लाम क्यूँ कुबूल किया?



आमिना थॉमस (भूतपूर्व ‘अन्नम्मा थॉमस’)
ईसाई पादरी की बेटी
केरल, भारत

"मैं दक्षिणी भारत के एक प्रोटेस्टेंट ईसाई घराने में पैदा हुई और पली-बढ़ी। लेकिन अब मैं बहुत ख़ुश हूं कि मैं एक मुस्लिम औरत हूं। केवल संयोगवश मुसलमान नहीं बनी, बल्कि ख़ूब सोच-समझकर मैंने इस्लाम का चयन किया है। संसार के पालनहार, जिसने सही रास्ते अर्थात् इस्लाम की ओर मेरा मार्गदर्शन किया, उसका मैं जितना भी शुक्र अदा करूं, कम है। मेरा इस्लाम क़बूल करना विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का परिणाम है। तुलनात्मक अध्ययन ने मेरे मन-मस्तिष्क को क़ायल किया कि इस्लाम ही एक सच्चा धर्म है और अल्लाह का अन्तिम धर्म है। इस्लाम के संबंध में मेरा अध्ययन जारी था कि बेहतर भविष्य के लिए मैं सऊदी अरब गई। यहां मैंने मुसलमानों और उनकी जीवनशैली का बहुत क़रीब से निरीक्षण किया।
सऊदी अरब में मुझे धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन का सुनहरा मौक़ा मिला। लिट्रेचर, ऑडियो, वीडियो कैसिटों के अलावा चलते-फिरते ज़िन्दा प्रमाणों ने मेरी बड़ी सहायता की। ये जीवंत प्रमाण वे मनुष्य थे, जिन्होंने सच्चाई और सत्य धर्म का रास्ता पाने के लिए बड़ी खोज और मेहनत की थी। जब उन्हें सीधी राह मिल गई तो उन्होंने ईसाइयत को अलविदा कहकर इस्लाम क़बूल कर लिया। उन लोगों की खोज और अनुभव मेरे लिए बड़े लाभदायक और मार्गदीप सिद्ध हुए।
अमेरिकी नवमुस्लिम श्रीमती ख़दीजा वॉटसन के साथ, जो किसी अमेरिकी यूनीवर्सिटी में धर्मशास्त्र (Theology) की प्रोफ़ेसर रह चुकी हैं, साक्षात् वार्तालाप आध्यात्मिक शान्ति की तलाश में मेरे लिए बड़ी लाभप्रद रही। इसी बीच मैंने उच्च शिक्षा प्राप्त नवमुस्लिमों की जीवनियों का अध्ययन किया। इनमें प्रोफ़ेसर अब्दुल अहद दाऊद (पूर्व नाम रेवरेंड डेविड बेंजमीन कलदानी), एक बिशप और रोमन कैथोलिक पादरी, ‘मुहम्मद इन दी बाइबल’ का लेखक क़िसीस (पादरी) चार्ल्स विलियम पिकथॉल के बेटे ‘मुहम्मद मारमाड्युक पिकथॉल की कथाएं’ बड़ी महत्वपूर्ण थीं।
मैं यह तो समझ गई थी कि एक ही ख़ुदा हर चीज़ का रचयिता है, लेकिन मुझे यह यक़ीन नहीं था कि सच्चा एक ख़ुदा ईसाइयत में है या इस्लाम में। यह हक़ीक़त है कि दोनों धर्म एक-दूसरे के बहुत क़रीब हैं, मगर इबादत का ढंग बिल्कुल अलग है। अब फिर मैं क्या करूं? यह सवाल मुझे लगातार परेशान कर रहा था। मैंने अपनी यह परेशानी अल्लाह के सामने पेश करने का फै़सला किया। ऐ मेरे अल्लाह! सही धर्म को चुनने में मेरा मार्गदर्शन कर। मैं केवल सच्चाई की तलाश में हूं, इसलिए मुझे गुमराह होने से बचा ले। अगर ईसाई धर्म सच्चा है तो फिर मुझे इस पर जमा दे और इसके बारे में मेरे मन में जो शंकाएं और भ्रम हैं, उन्हें दूर कर दे। अगर इस्लाम सच्चा है तो फिर इसकी सच्चाई की पुष्टि कर और मेरे दिल में इसको जमा दे। मेरी मदद कर और मेरे अन्दर इतनी हिम्मत पैदा कर दे कि मैं अपने भावी धर्म के रूप में उसको कष्बूल कर लूं।’’
क़ुरआन और बाइबल के तुलनात्मक अध्ययन और सच्चे दिल से अल्लाह के सामने दुआ ने इस्लाम की ओर झुके हुए मेरे दिल को ताक़त दी और मैं अन्दर ही अन्दर मुसलमान हो गई। मैंने मुसलमानों की तरह नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी। पूरी नमाज़ के दौरान में मैंने महसूस किया कि इस्लाम की सबसे ज़्यादा आकर्षक चीज़ नमाज़ ही है।
"
- आमिना थॉमस
(भूतपूर्व ‘अन्नम्मा थॉमस’)
ईसाई पादरी की बेटी
केरल, भारत

क़ुरआन में एकेश्वरवाद से संबंधित शिक्षाएं एवं शिर्क का नकार

क़ुरआन में एकेश्वरवाद से संबंधित शिक्षाएं एवं शिर्क का नकार

1. अल्लाह यकता है (उसमें किसी प्रकार की अनेकता नहीं है)। वह किसी का मुहताज नहीं, सब उसके मुहताज हैं। न उसकी कोई संतान है न वह किसी की संतान है; और वह बेमिसाल, बेजोड़ है, कोई उसका समकक्ष नहीं है। (सार-112:1-4)

2. अल्लाह ही हरेक का रब है अतः उसी की बन्दगी (दासता) अपनाओ, यही सीधा मार्ग है। (सार-3:51)

3. जो लोग (ईशग्रंथ में) अपनी ओर से गढ़कर झूठी बातें अल्लाह से जोड़ते रहे वे वास्तव में अत्याचारी हैं। (सार-3:94)

4. तारे...,..., चांद, सूरज आदि, जिसके पक्ष में ईश्वर ने कोई प्रमाण अवतरित नहीं किया है, ईश्वर के ईश्वरत्व में साझीदार नहीं हैं क्योंकि ज़मीन और आसमानों की रचना तो ईश्वर ने की है। (सारांश-6:76-81)

5. अल्लाह की बन्दगी करो, उसके सिवा कोई तुम्हारा उपास्य नहीं है। (सार-7:59, 7:65, 7:73, 7:85, 11:61, 11:84)

6. बहुत सारे भिन्न-भिन्न प्रभुओं के बजाय वह एक अल्लाह बेहतर है जिसे सब पर प्रभुत्व प्राप्त है। (सार, 12:39)

7. अल्लाह को छोड़कर जिनकी बन्दगी की जा रही है वे कुछ नाम हैं जिन्हें लोगों के पूर्वजों न रख लिए थे...शासन-सत्ता अल्लाह के सिवाय किसी के लिए नहीं है। उसके आदेशानुसार, उसके सिवाय किसी की बन्दगी न करो, यही बिल्कुल सीधी जीवन-प्रणाली है। (सार, 12:40)

8. उन चीज़ों की उपासना आख़िर क्यों, जो न सुनती हैं, न देखती हैं न किसी का कोई काम बना सकती हैं। (सार, 19:42)

9. मैं ही अल्लाह हूं, मेरे सिवाय कोई पूज्य नहीं अतः मेरी ही बन्दगी करो। (सार, 20:14)

10. लोगो, तुम्हारा पूज्य तो बस एक अल्लाह ही है जिसके सिवाय कोई और पूज्य नहीं है। हर चीज़ पर उसका ज्ञान हावी है। (20:98)

11. अल्लाह बस शिर्क (अपना कोई साझीदार बनाए जाने) को माफ़ नहीं करता...जिसने किसी को अल्लाह का साझीदार ठहराया उसने बहुत बड़ा झूठ रचा और घोर पाप किया। (सारांश, 4:48)

12. जिसने अल्लाह के साथ किसी को साझी ठहराया उस पर अल्लाह ने स्वर्ग को हराम कर दिया, उसका ठिकाना नरक है...। (सार, 5:72)

13. अल्लाह के सिवाय दूसरों को पूज्य बनाने का क्या औचित्य है जबकि इसका प्रमाण ईश-ग्रंथों (क़ुरआन सहित) में नहीं है। (सार, 21:27)

14. (पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल॰ से) पहले के ईशदूतों द्वारा भी अल्लाह ने यही शिक्षा अवतरित की थी कि उसके सिवाय कोई और पूज्य नहीं है अतः लोग उसी की बन्दगी करें। (सार, 21:25)

15. अल्लाह को छोड़कर उन चीज़ों को पूजना उचित कैसे हो सकता है जो न कोई फ़ायदा पहुंचा सकती हैं, न नुक़सान। (सार, 21:66)

16. अल्लाह की बन्दगी करो, उसके सिवाय तुम्हारे लिए कोई पूज्य नहीं है। क्या तुम (ऐसे अनुचित कृत्य से) बचते नहीं हो? (सार, 23:32)

17. ऐसी मूर्तियों की पूजा भला क्या करनी जो न किसी की पुकार-प्रार्थना सुन सकती हों, न कोई लाभ-हानि पहुंचा सकती हों; सिर्फ़ इसलिए कि बाप-दादा ऐसा ही करते आए हैं? अस्ल में पूरे संसार का प्रभु तो वह (ईश्वर) है जो इन्सान को पैदा करता, मार्गदर्शन करता, खिलाता-पिलाता, बीमार हो जाने पर, स्वास्थ्य देता, और मौत देता है और फिर दोबारा (पारलौकिक) जीवन वही प्रदान करेगा। (सार, 26:72-81) अल्लाह ईश्वर के अलावा जिनकी भी पूजा की जाती है वे रोज़ी (आजीविका) देने का सामर्थ्य नहीं रखते। उसी से रोज़ी मांगो, उसी की बन्दगी करो, उसी के कृतज्ञ बनकर रहो। (मृत्यु पश्चात्) उसी की ओर पलटकर (परलोक में) जाने वाले हो। (सार, 29:17)

18. कोई बड़ी मुसीबत पड़ने पर या ज़िन्दगी की आख़िरी घड़ी आ जाने पर ज़रा सच-सच बताओ कि क्या तुम अल्लाह के साथ ठहराए हुए सीझीदारों से प्रार्थना करने के बजाय उन्हें भूलकर सिर्फ़ अल्लाह (ईश्वर) को ही नहीं पुकारते? (उसी से प्रार्थना नहीं करते?) (सार, 6:40,41)

19. समुद्री तूफ़ान में घिर जाने पर तुम एकाग्रचित होकर, अल्लाह से ही, बचाने की प्रार्थनाएं करते हो, और जब वह तुम्हें बचा लेता है तो फिर असत्य रूप से धर्ती पर (ईश्वर के प्रति ही) विद्रोहात्मक नीति धारण कर लेते हो। लोगो यह दुनिया की ज़िन्दगी के थोडे़ दिन के मज़े हैं, तुम्हारा यह विद्रोह तुम्हारे ही विरुद्ध पड़ रहा है, तुम्हें पलटकर अल्लाह ही के पास जाना है। (सार, 10:22,23, 17:67, 31:32)

20. वही ईश्वर ही तो है जिसने तुम्हारे लिए धर्ती का बिछौना बिछाया, आकाश की छत बनाई, पानी बरसाया, पैदावार निकाल कर तुम्हारे लिए रोज़ी जुटाई। तुमको यह सब मालूम है, तो फिर दूसरों को अल्लाह का समकक्ष मत ठहराओ। (सार, 2:22)

21. दाने और गुठली को फाड़कर पौधा और पेड़ उगाने वाला सजीव को निर्जीव से और निर्जीव को जीव से निकालने वाला अल्लाह है। फिर तुम (उसे छोड़ दूसरों की बन्दगी व उपासना करके) किधर बहके चले जा रहे हो? (सार, 6:95)

22. वही ईश्वर रात का परदा फाड़ कर सुबह निकालता है। उसी ने रात को तुम्हारे आराम व सुकून का समय बनाया; चांद व सूरज के निकलने-डूबने का हिसाब (प्रणाली) निश्चित किया। तारों को ज़मीन और समुद्र के अंधेरों के बीच रास्ता जानने का साधन बनाया, आसमान से पानी बरसाया उससे तरह-तरह की वनस्पति उगाई, हरे-भरे खेत, पेड़ पैदा किए, उनसे तले-ऊपर चढ़े हुए (अनाज व फल के) दाने निकाले। इन सब में, समझ-बूझ रखने वालों के लिए (विशुद्ध एकेश्वरवाद की) निशानियां और स्पष्ट प्रमाण हैं। (सार, 6:96-99)

23. तुम्हारा प्रभु, वास्तव में अल्लाह ही है जिसने आकाशों और धर्ती को बनाया जो रात को दिन पर ढांक देता है, जिसने सूरज, चांद, तारे पैदा किए जो (अपने काम, गति व Orbiting आदि में) उसके आदेश के अधीन हैं। सृष्टि उसी की, आदेश उसी का, वही सारे संसारों का मालिक व पालनहार, स्वामी व प्रभु; तो बस उसी से प्रार्थनाएं करो (किसी दूसरे से नहीं)। (सार, 7:54-55)

24. अल्लाह के सिवाय कोई नहीं जो उसके द्वारा डाली हुई किसी मुसीबत को तुम पर से टाल दे और अल्लाह कोई भलाई करना चाहे तो कोई भी शक्ति उसे इससे रोक नहीं सकती। अल्लाह के सिवा किसी ऐसे को न पुकारो जो तुम्हें न फ़ायदा पहुंचा सके न नुक़सान। (सार, 10:106-107)
25. अगर अल्लाह के सिवाय दूसरे पूज्य भी होते तो ज़मीन व आसमान दोनों की व्यवस्था बिगड़ जाती।(सार, 21:22)

26. अल्लाह ने किसी को अपनी औलाद नहीं बनाया है, उसके साथ कोई और दूसरा ख़ुदा नहीं है। कई और ख़ुदा भी होते तो हर एक अपनी सृष्टि को लेकर अलग हो जाता और फिर वे एक-दूसरे पर चढ़ दौड़ते। (सार, 23:91)

27. एकेश्वरवाद की कुछ निशानियां (प्रमाण): (1) सभी इन्सानों केा मिट्टी से पैदा करना (शरीर-रचना के सारे तत्व मिट्टी में मौजूद (2) इन्सानों की सहजाति से ही उनके जोड़े बनाना, एक-दूसरे से सुकून-शान्ति पाते हैं, जोड़े में आपसी प्रेम व दयालुता पैदा कर देना (3) आसमानों और ज़मीन की सृष्टि (4) सारे इन्सानों में रंग और बोली की भिन्नता (5) रातों को सोने के और दिन को रोज़ी कमाने के अनुकूल बनाना (6) बिजली की चमक, तथा मुर्दा ज़मीन को ज़िन्दगी प्रदान करने वाली बारिश (7) आसमानों और ज़मीन का क़ायम रहना (8) बेजान ज़मीन से अनाज और भांति-भांति के फल निकालना जिन्हें इन्सान पैदा नहीं कर सकते (9) वनस्पतियों और स्वयं मनुष्यों में जोड़े पैदा करना (10) रात पर से दिन को हटा लेना और अंधेरा छा जाना (11) सूर्य का अपनी कक्षा (Orbit) में चलना और चांद को अनेक चरणों से गुज़ारना (12) सारे नक्षत्रों का अपनी-अपनी कक्षा में एक हिसाब से तैरते जाना। (सार, 30:20-25, 36:33-40)

28. विशुद्ध एकेश्वरवाद के तर्क का एक उदाहरण: जब तुम अपने दासों (नौकरों, सेवकों आदि) को अपने स्वामीत्व में, अपने माल-दौलत में, अपने अधिकारों में शरीक होना पसन्द और बर्दाश्त नहीं करते तो फिर ईश्वर के प्रभुत्व, स्वामित्व व अधिकारों में दूसरों को साझी व समकक्ष क्यों बनाते हो? (भावार्थ, 30:28)

29. क्या अल्लाह के सिवाय कोई और स्रष्टा भी है जो तुम्हें आसमान व ज़मीन से रोज़ी देता हो? अल्लाह को हर चीज़ का सामर्थ्य प्राप्त है, वह अपनी सृष्टि-रचना में जैसी चाहता है अभिवृद्धि करता है। अपनी जिस रहमत का दरवाज़ा खोलना चाहे उसे कोई बन्द करने वाला या जिसे वह बन्द कर दे उसे कोई खोलने वाला नहीं है। उसके सिवाय कोई उपास्य नहीं, आख़िर तुम कहां धोखा खाए चले जा रहे हो? (सार, 35:1-3)

30. वह (ईश्वर) जब किसी काम का इरादा करता है तो बस आदेश दे देता है कि ‘‘हो जा’’, और वह काम हो जाता है। उसके ही हाथ में हर चीज़ का पूर्ण अधिकार है (अर्थात् किसी चीज़ के लिए वह किसी पर निर्भर नहीं, किसी भी काम के लिए किसी पर आश्रित नहीं और अधिकार, सामर्थ्य, शक्ति आदि में कोई दूसरा उसका साझीदार नहीं)। (सार, 36:82,83)

31. जो कुछ ज़मीन में जाता है, उसमें से निकलता है; आसमान से उतरता और उसमें चढ़ता है, वह (ईश्वर) सब मुख्य व समवेत और गौण व अंश का ज्ञाता है। जो काम भी तुम करते हो उसे वह देख रहा है। ज़मीन व आसमानों के राज्य का मालिक है और फ़ैसले के लिए सारे मामले उसी की ओर जाते हैं, वह दिलों में छुपे हुए रहस्यों तक को जानता है। (सार, 57:4-6)

32. धर्ती और आकाशों का शासन-सत्ता अल्लाह के लिए है उसके सिवाय कोई तुम्हारा संरक्षक, सहायक नहीं। (सार, 2:107)

33. जिसने अल्लाह का सहारा थामा उसने ऐसा मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटने वाला नहीं है। वह सब कुछ सुनने वाला, जानने वाला है। (सार, 2:256)

34. अल्लाह राज्य का स्वामी है, जिसे चाहे दे, जिससे चाहे छीन ले, वह हर काम में समर्थ है। रात को दिन में पिरोता हुआ ले आता है और दिन को रात में। निर्जीव में से जीवधारी को निकालता है और जीवधारी में से निर्जीव को, और जिसे चाहता है अत्यधिक रोज़ी देता है। (सार, 3:26,27)

35. आकाशों और धर्ती की सारी चीज़ें चाहे-अनचाहे अल्लाह की आज्ञाकारी हैं और उसी की ओर सब को पलटना है। (सार, 3:83)

36. कोई प्राणी ईश्वर अल्लाह की अनुमति के बिना मर नहीं सकता, मौत का समय तो लिखा हुआ (अर्थात् निश्चित किया हुआ) है। (सार, 3:145)

जिहाद का अर्थ

∗ जिहाद का वास्तविक अर्थ होता है
“संघर्ष करना”….

अक्सर हमारे नोंमुस्लिम भाइयों में यह ग़लतफहमी पायी जाती है के वो जिहाद जैसे शब्द का तथाकथित लोगों से अलग अलग अर्थ समझकर मुसलमानों के अमन के पैगाम को ठुकरा देते है, आईये आज इसका सही मूल्य जानने की कोशिश करते है…
» जिहाद : अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है “संघर्ष करना” , “जद्दो जेहद करना”. इसका मूल शब्द जहद है, जिसका अर्थ होता है “संघर्ष”. ये अरबी भाषा में हर प्रकार के संघर्ष के लिए उपयोग होता है. जिहाद का अर्थ किसी की जान लेना,क़त्ल करना या किसी बेगुनाह को मारना नही है. जिहाद एक पवित्र शब्द एवं कर्म है जिसे इस्लाम को न समझने वाले व्यक्तियों ने तोड़मरोड़ के पेश किया. कई लोग जिहाद का अर्थ पवित्र युद्ध समझते हैं जो सरासर गलत है, क्योंकि युद्ध के लिए अरबी भाषा में अलग शब्द “गजवा” या “मगाजी” उपयोग होता है.
इस्लाम के शुरुवाती दिनों में मक्का के अन्न्याई मुशरिकीनो ने जब अमन का मुहायदा (शांति सन्देश) तोडा और मुस्लिमों का जीना दुश्वार कर दिया, तब इन्हे अपने हक के लिए जिहाद का हुक्म हुआ.
जिहाद के दो किस्मे है -
१. जिहाद अल-अकबर (बड़ा जिहाद) -
जिहाद अल-अकबर बड़ा जिहाद है जिसका मतलब होता है इन्सान खुद अपने अन्दर की बुराईयों लढ़े, अपने बुरे व्यवहार को अच्छाई में बदलने की कोशिश करे, अपनी बुरी सोचो और बुरी ख्वाहिशो को कुचल कर एक अच्छा और आस्थिक इन्सान बने. इस जिहाद को अल्लाह ने कुरान में जिहाद अल-अकबर यानी सबसे बड़ा जिहाद कहा है.
२. जिहाद अल असग़र (छोटा जिहाद) -
जिहाद अल-असग़र का उद्देश्य समाज में फैली बुरायिओं के खिलाफ संघर्ष (जद्दो जेहद) करना होता है. जब समाज में ज़ुल्म बढ़ जाये, बुराई अच्छाई पर हावी होने लग जाये, अच्छाई बुराई के आगे हार मानने लग जाये, हक पर चलने वालो को ज़ुल्म व सितम सहन करना पड़े तो उसको रोकने की कोशिश (जद्दो जेहद) करना और उसके लिए बलिदान देना “जिहाद अल-असग़र” है। और इस जिहाद को अल्लाह ने जिहाद अल-अकबर से छोटा जिहाद कहा है. यानी जिहाद अल-अकबर जो के खुद अपने अन्दर की बुरायिओं से लड़ना बड़ा जिहाद है और तलवार की लडाई छोटी लडाई है जिसे अल्लाह ने जिहाद अल-असगर कहा है.
» जिहाद की अलग अलग परिभाषाये -
1) “अर्थात अपने हक के लिए संघर्ष करना भी एक प्रकार का जिहाद है.”
2) “जिहाद का एक अर्थ अन्याय के खिलाफ लड़ना या संघर्ष करना भी है.”
3) “सत्य के लिए जान की बाज़ी लगाना भी जिहाद है”
4) “माता-पिता की सेवा भी एक प्रकार का जिहाद है”
5) “अपनी नफ़्स (इन्द्रियों) को काबू करना भी एक प्रकार का जिहाद है.
6) “अपने वक्तव्यों से अन्याय के खिलाफ लड़ाई भी एक जिहाद है.
7) “अपने लेखों से अन्याय के खिलाफ लड़ाई जिहाद बिल कलम है.
8) “एक जगह इल्म हासिल करने को भी जिहाद के बराबर कहा गया है”. इस्लाम में जिहाद का बहुत महत्व है, इसे ईमान का एक हिस्सा कहा गया है. मीडिया एवं इस्लाम के दुश्मनों द्वारा आमजन जो अरबी भाषा और इस्लाम से अनभिज्ञ है, को जिहाद का गलत अर्थ बताकर जिहाद और इस्लाम को बहुत बदनाम किया गया है.
अगर आप इस्लाम या इस्लाम से सम्बन्ध किसी भी विषय को समझना चाहते हैं तो हमें चाहिए की हम अल्लाह के रसूल मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) साहब की जीवनी के साथ कुरान का अनुवाद पढ़ें. जिससे हमें परिपूर्ण ज्ञान मिल सके.

Thursday, 4 September 2014

पुनर्जन्म का सच


पुनर्जन्म का शाब्दिक अर्थ होता हैं दोबारा से जन्म पुन: अर्थात दोबारा, जन्म अर्थात जन्म, पुनर्जन्म का अर्थ दोबारा से जन्म होता हैं न की बार-बार तीसरी या चौथी आदि बार जन्म, इस्लाम पुनर्जन्म में विश्वास रखता हैं और ये उसकी बुनयादी शिक्षाओ में से एक हैं हर मुसलमान मरने के बाद महाप्रलय (क़यामत) के दिन दोबारा से जिंदा किये जाने पर विश्वास रखता हैं और दूसरी बात बार-बार, हर बार के लिए बिलकुल अलग ही परिभाषित शब्द होता हैं जिसे हम अवागमन के नाम से जानते हैं अवागमन का सिद्धान्त में धारणा रखने वाले लोग यह विश्वास रखते हैं की व्यक्ति अपने पिछले कर्मो के अनुसार इसी लोक में अलग अलग योनियो में पैदा किया जाता हैं और पिछले कर्मो के अनुसार ही वो इस जीवन में जीवन व्यतीत करता हैं,

आइये, अवागमन के सिद्धान्त को मानने वाले लोग क्या-क्या धरना रखते हैं उसे देखें:

(1) कुछ लोगो का मानना हैं कि 'मनुष्य अपने कर्मानुसार ही इसी लोक में जानवर या वनस्पति श्रेणी में जन्म लेता हैं।'
(2) कुछ लोग यह मानते हैं कि 'हम नर्क या स्वर्ग में तो जायेंगे मगर हमारे हिस्से में कुछ पुण्ये या पाप बचेगा तो इश्वर हमें फिर इसी दुनिया में किसी भी जीव कि श्रेणी में भेज देगा और फिर यही क्रम चलता रहेगा।'
(3) कुछ लोग ये कहते हैं कि 'अवागमन के चक्र से कभी किसी को मुक्ति नहीं मिलेगी।'
(4) कुछ लोग ये कहते हैं कि 'नहीं, बार-बार जन्म लेते रहने से कभी तो पाप खत्म होंगे-फिर हम को मोक्ष प्राप्त हो जायेगा।'
(5) कुछ अन्य लोग यह कहते हैं कि 'इंसान अपने बुरे कर्मो के बदले में कोई जानवर या वनस्पति बनेगा और इसी लोक में अपने बुरे कर्मो के फल भुक्तेगा'।

आइये आवागमन के सिद्धान्त का बुद्धि-विवेक व शास्त्रों के आधार पर विवेचनात्मक मूल्यांकन करें-

सबसे पहले ये ज्ञात रहे कि सत्य एक होता और झूट कई प्रकार का होता हैं। पुनर्जन्म कि आस्था सब इश्ग्रन्थो में एक प्रकार कि हैं चाहे वो वेदों में हो या बाइबिल में या फिर कुरान में, लेकिन आवागमन में आस्था कई प्रकार से दिखाई जाती हैं, जिससे मालूम होता हैं कि पुनर्जन्म का सिद्धान्त सही हैं और आवागमन का ग़लत।

कर्म योनि - भोग योनि

कर्म योनि वो योनि होती हैं जहा हमें कर्म करने होते हैं। भोग योनि वो योनि होती हैं जहा हमें हमारे कर्म के अनुसार भोग भोगना होता हैं।
हिन्दू पोराणिक विधान के अनुसार मनुष्य योनि 'कर्म व भोग दोनों योनि हैं' अर्थात मनुष्य को केवल इसी योनि में कर्म करने होते हैं और साथ साथ उसे अपने पिछले कर्मो का फल भी भोगना होता हैं। जबकि 'जानवर व वनस्पति योनि' केवल भोग योनि होती हैं, वहा कोई कर्म नहीं होता अर्थात जानवर तो इसलिए जानवर हैं क्यूंकि पहले वे मनुष्य योनि में कुछ ऐसे कर्म करके आया था कि अब वो जानवर बना दिया गया।

हमें हमारे धार्मिक ग्रंथो और विज्ञान ने बताया कि समय के प्रारंभ में इस धरती पर कुछ नहीं था ये धरती सूर्य का एक अंग थी हीर वो अंग अलग हो कर सूर्य के चारो ओर चक्कर काटने लगा इसलिए धरती के अन्दर आज भी भीषण गर्मी हैं। उस ठन्डे हिस्से को भुप्रष्ट या भूपटल कहते हैं जिस पर हम रहते हैं इस भूपटल के ठंडा होने के बहुत अन्तराल के बाद, इस पर पानी बरसा, फिर भिन्न-भिन्न प्रकार कि वनस्पति उगी, फिर एक लम्बी अवधि के के उपरान्त, जानवर आये फिर वनस्पति व जानवरों कि दीर्घावधि के के बाद मनुष्य इस धरती पर आया। ये पूरी कार्यप्रणाली एक ज्ञात सत्य हैं।
इस कार्यप्रणाली को देखें तो हमे पता चलता हैं कि
(का) पहले इस धरती का कुछ भी नहीं था,
(ख) फिर पानी बरसा और पेड़ पोधे उगे जो कि केवल भोग योनि हैं।
(ग) फिर एक दीर्घावधि गुज़र जाने के बाद जानवर इस धरती पर आये ये भी भोग हैं।
(घ) जानवरों कि दीर्घावधि उपरान्त भूपटल पर हम मनुष्य आये, जो कि भोग व कर्म योनि हैं।
अगर हम इस पूरी प्रणाली पर नज़र डाले तो यह इस पोस्ट के नीचे के चित्र के सामान होगी

अब प्रश्न जो हर चिंतन करने वाले कि बुद्धि में आएगा वो ये कि ऊपर उध्दरित तथ्य में भोग योनिय तो पहले आई और कर्म योनि बाद में!!! ऐसा कैसे संभव हैं? होना तो यह चाहिए था कि पहले मनुष्य आता वो कर्म करता फिर अपने कर्मो के भोग भोगता परन्तु ऐसा हुआ नहीं पहले ईश्वर ने एक नहीं दो दो योनियाँ रखी और बाद में मनुष्य को भेजा क्यूंकि हमारा मालिक सर्वज्ञता हैं। उसे मालूम था कि कुछ लोग 'आवागमन' के सिद्धान्त में फंसकर अपने मृत्यु उपरांत अनंत जीवन, जो उन्हें इश्वर के पास प्राप्त होना था, उसे सदा के लिए नर्क में प्रवेश पाकर नष्ट कर लेंगे। हमारे अति कृपालु ईश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति के अन्तकरण में चेतना रखी हैं। आवश्यकता हैं की हम स्वयं अपने विवेक से निर्णय करें।




Monday, 7 April 2014

धर्म का अर्थ


'धर्म' का अर्थ होता हैं धारण करना, मोक्ष अर्थात स्वर्ग में जाने के लिए चार चीज़ो का धारण करना आवश्यक हैं

1. विश्वास: सर्वप्रथम ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास लाना और उसके ईशदूतों (नबियो), उसकी किताब, फरिश्तो (देवताओ), भाग्य, स्वर्ग, नर्क, अंतिम दिन आदि पर विश्वास रखना

2. सद्कर्म (नेक आमाल): अल्लाह (ईश्वर) के बताये अनुसार हर मनुष्य के लिए प्रेम कि भावना रखना किसी के साथ भेदभाव, छुआछूत आदि का व्य्वहार न करना और उसके बताये अनुसार उसकी उपासना (इबादत) करना नमाज़ पढ़ना, रोज़ा रखना, ज़कात देना, हज करना ग़रीबो को दान देना भूखो को खाना खिलाना लोगो की भलाई के लिए कार्य करना आदि.

3. सत्य बताना: जो भी धर्म का ईश्वर का सच्चा ज्ञान आप तक पहुच गया हैं उसे दुसरो तक पहुचाना अपने और दुसरो की मुक्ति और मोक्ष के लिए कार्य करना

4. धैर्य (सब्र): हर लम्हा धैर्य से काम लेना और विश्वास रखना की ईश्वर अच्छा करेंगे और दुसरो को भी धेर्य की नसीहत करना हमेशा सच्चाई पर डटे रहना

Friday, 24 May 2013

महात्मा गांधी और इस्लाम

1. गाँधी जी ने हरिजन पत्रिका में 1937 में लिखा था कि, "यदि हमें स्वराज प्राप्त होता है तो हम देश की शासन प्रणाली हज़रत उमर (द्वितीय ख़लीफा) की ख़िलाफ़त की तर्ज़ पर चलाएंगे।
यदि परिवर्तन लाना ही है तो गांधीजी द्वारा पसन्द की गई शासन व्यवस्था की भी कुछ झलक देख ली जाय-

हज़रत उमर द्वारा लागू किये गए इस्लामी शरीयत के क़ानून के मुताबिक़ -
* फौजदारी के क़ानून मुस्लिम और ग़ैरमुस्लिम दोनों पर बराबर लागू होंगे चाहे मुसलमान का माल ग़ैरमुस्लिम चुराए या ग़ैरमुस्लिम का माल मुसलमान चुराए, सज़ा दोनों को बराबर मिलेगी।
* शराब बनाने, बेचने या पीने के मामले में सज़ा के हक़दार केवल मुसलमान होंगे।
* सूद और उसका कारोबार सबके लिए अपराध होगा।
* शराब की तरह से ही सूअर पालने, उसका मांस बेचने और खाने पर ग़ैरमुस्लिमों को न रोका जायेगा। यहाँ तक कि अगर कोई मुसलमान किसी ग़ैरमुस्लिम के सूअर या शराब को नुक़सान पहुंचाता है तो उससे उस माल का हर्जाना दिलवाया जाएगा।

यह कुछ हलकी सी झलकियाँ पेश की गई हैं ताकि इनका अध्ययन करके देश हित में जिसको जनता उचित समझे उसके अनुसार परिवर्तन लाने की कोशिश एक अच्छा क़दम साबित होगी।


2. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1937 में अपने लेक्चर में सादगी की जिन्दगी गुजारने का मशवरा देते हुए कहा:
''कि मैं रामचंद्र और कृष्ण का हवाला नहीं दे सकता हूं
क्यूकि वो तारीखी हस्तियां नहीं हैं, मैं मजबूर हूं
सादगी के लिए हजरत अबु बकर रजि. और हजरत उमर रजि.
का नाम पेश करता हूं, वो बहुत बडी सलतन्त के हाकिम थे
मगर उन्हों ने सादगी की जिन्दगी गुजारी
“Mahatma Gandhi in his statement in in the “Tej” dated
5th October 1925 said “Mahabharata’s
Krishna never existed on the earth.”
He said in Harijan dated 27th July 1937 that
“I do not mention the name of Rama and
Krishna, because they were not historical
figures, but I am inclined to mention the
names of Abu-Bakr and Umar.
“Gandhi in his statement in in the “Tej” dated
5th October 1925


3.  

Miracles of Quran: धरती की अवस्था: गोल या चपटी #2

प्राराम्भिक ज़मानों में लोग विश्वस्त थे कि ज़मीन चपटी है, यही कारण था कि सदियों तक मनुष्य केवल इसलिए सुदूर यात्रा करने से भयाक्रांति करता रहा कि कहीं वह ज़मीन के किनारों से किसी नीची खाई में न गिर पडे़! सर फ्रांस डेरिक वह पहला व्यक्ति था जिसने 1597 ई0 में धरती के गिर्द ( समुद्र मार्ग से ) चक्कर लगाया और व्यवहारिक रूप से यह सिद्ध किया कि ज़मीन गोल (वृत्ताकार ) है। यह बिंदु दिमाग़ में रखते हुए ज़रा निम्नलिखित क़ुरआनी आयत पर विचार करें जो दिन और रात के अवागमन से सम्बंधित है:
‘‘ क्या तुम देखते नहीं हो कि अल्लाह रात को दिन में पिरोता हुआ ले आता है और दिन को रात में ‘‘
(अल-.क़ुरआन: सूर: 31 आयत 29 )
यहां स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि अल्लाह ताला ने क्रमवार रात के दिन में ढलने और दिन के रात में ढलने (परिवर्तित होने )की चर्चा की है ,यह केवल तभी सम्भव हो सकता है जब धरती की संरचना गोल (वृत्ताकार ) हो। अगर धरती चपटी होती तो दिन का रात में या रात का दिन में बदलना बिल्कुल अचानक होता ।
निम्न में एक और आयत देखिये जिसमें धरती के गोल बनावट की ओर इशारा किया गया है:
उसने आसमानों और ज़मीन को बरहक़ (यथार्थ रूप से )उत्पन्न किया है ,, वही दिन पर रात और रात पर दिन को लपेटता है।,,(अल.-क़ुरआन: सूर:39 आयत 5)
यहां प्रयोग किये गये अरबी शब्द ‘‘कव्वर‘‘ का अर्थ है किसी एक वस्तु को दूसरे पर लपेटना या overlap करना या (एक वस्तु को दूसरी वस्तु पर) चक्कर देकर ( तार की तरह ) बांधना। दिन और रात को एक दूसरे पर लपेटना या एक दूसरे पर चक्कर देना तभी सम्भव है जब ज़मीन की बनावट गोल हो ।
ज़मीन किसी गेंद की भांति बिलकुल ही गोल नहीं बल्कि नारंगी की तरह (geo-spherical) है यानि ध्रुव (poles) पर से थोडी सी चपटी है। निम्न आयत में ज़मीन के बनावट की व्याख्या यूं की गई हैः ‘‘और फिर ज़मीन को उसने बिछाया ‘‘(अल क़ुरआन: सूर 79 आयत 30)
यहां अरबी शब्द ‘‘दहाहा‘‘ प्रयुक्त है, जिसका आशय ‘‘शुतुरमुर्ग़‘‘ के अंडे के रूप, में धरती की वृत्ताकार बनावट की उपमा ही हो सकता है। इस प्रकार यह माणित हुआ कि पवित्र क़ुरआन में ज़मीन के बनावट की सटीक परिभाषा बता दी गई है, यद्यपि पवित्र कुरआन के अवतरण काल में आम विचार यही था कि ज़मीन चपटी है।

Miracles of Quran: अंतरिक्ष विज्ञान (Astrology)

सृष्टि की संरचना: ‘‘बिग बैंग ‘‘अंतरिक्ष विज्ञान के विशेषज्ञों ने सृष्टि की व्याख्या एक ऐसे सूचक (phenomenon) के माध्यम से करते हैं और जिसे व्यापक रूप ‘‘से बिग बैंग‘‘(big bang) के रूप में स्वीकार किया जाता है। बिग बैंग के प्रमाण में पिछले कई दशकों की अवधि में शोध एवं प्रयोगों के माध्यम से अंतरिक्ष विशेषज्ञों की इकटठा की हुई जानकारियां मौजूद है ‘बिग बैंग‘ दृष्टिकोण के अनुसार प्रारम्भ में यह सम्पूर्ण सृष्ठि प्राथमिक रसायन (primary nebula) के रूप में थी फिर एक महान विस्फ़ोट यानि बिग बैंग (secondry separation) हुआ जिस का नतीजा आकाशगंगा के रूप में उभरा, फिर वह आकाश गंगा विभाजित हुआ और उसके टुकड़े सितारों, ग्र्रहों, सूर्य, चंद्रमा आदि के अस्तित्व में परिवर्तित हो गए कायनात, प्रारम्भ में इतनी पृथक और अछूती थी कि संयोग (chance) के आधार पर उसके अस्तित्व में आने की ‘‘सम्भावना: (probability) शून्य थी । पवित्र क़ुरआन सृष्टि की संरचना के संदर्भ से निम्नलिखित आयतों में बताता है:
‘‘क्या वह लोग जिन्होंने ( नबी स.अ.व. की पुष्टि ) से इन्कार कर दिया है ध्यान नहीं करते कि यह सब आकाश और धरती परस्पर मिले हुए थे फिर हम ने उन्हें अलग किया‘‘(अल – क़ुरआन: सुर: 21, आयत 30 )
इस क़ुरआनी वचन और ‘‘बिग बैंग‘‘ के बीच आश्चर्यजनक समानता से इनकार सम्भव ही नहीं! यह कैसे सम्भव है कि एक किताब जो आज से 1400 वर्ष पहले अरब के रेगिस्तानों में व्यक्त हुई अपने अन्दर ऐसे असाधारण वैज्ञानिक यथार्थ समाए हुए है?
आकाशगंगा की उत्पत्ति से पूर्व प्रारम्भिक वायुगत रसायन
वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि सृष्टि में आकाशगंगाओं के निर्माण से पहले भी सृष्टि का सारा द्रव्य एक प्रारम्भिक वायुगत रसायन (gas) की अवस्था में था, संक्षिप्त यह कि आकाशगंगा निर्माण से पहले वायुगत रसायन अथवा व्यापक बादलों के रूप में मौजूद था जिसे आकाशगंगा के रूप में नीचे आना था. सृष्टि के इस प्रारम्भिक द्रव्य के विश्लेषण में गैस से अधिक उपयुक्त शब्द ‘‘धुंआ‘‘ है।
निम्नांकित आयतें क़ुरआन में सृष्टि की इस अवस्था को धुंआ शब्द से रेखांकित किया है।
‘‘फिर वे आसमान की ओर ध्यान आकर्षित हुए जो उस समय सिर्फ़ धुआं था उस (अल्लाह) ने आसमान और ज़मीन से कहा:अस्तित्व में आजाओ चाहे तुम चाहो या न चाहो‘‘ दोनों ने कहा: हम आ गये फ़र्मांबरदारों (आज्ञाकारी लोगों) की तरह‘‘(अल ..कु़रआन: सूर: 41 ,,आयत 11)
एक बार फिर, यह यथार्थ भी ‘‘बिग बैंग‘‘ के अनुकूल है जिसके बारे में हज़रत मुहम्मद मुस्तफा़ (स.अ.व. )की पैग़मबरी से पहले किसी को कुछ ज्ञान नहीं था (बिग बैंग दृष्टिकोण बीसवीं सदी यानी पैग़मबर काल के 1300 वर्ष बाद की पैदावार है )
अगर इस युग में कोई भी इसका जानकार नहीं था तो फिर इस ज्ञान का स्रोत क्या हो सकता है?

Saturday, 15 December 2012

इस्लाम की प्रमुख शिक्षाएं


)( ईश्वर एक है, उसका कोई साझी नहीं। वह अकेला है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। वह अत्यंत कृपाशील और दयावान् है।
)( ईश्वर अपने बन्दों के प्रति इतना उदार है कि उनकी ग़लतियों और भूलों को क्षमा कर देता है बशर्ते कि वे उसकी ओर रुजू करें। गुनाहगार और पापी भी यदि पश्चाताप प्रकट करके पवित्र जीवन की प्रतिज्ञा करता है तो उस पर भी ईश्वर दया करता है।
)( जिनलोगों ने ईश्वर का भय रखा और परह
ेज़गारी का जीवन बिताया उनके लिए स्वर्ग है। और जिन्होंने ईश्वर का इन्कार किया औन सरकशी का जीवन बिताया उनका ठिकाना निश्चित रूप से नरक है।
)( जो व्यक्ति झूठ न बोले, वादा करके न तोड़े, अमानत में ख़यानत न करे, आंखें नीची रखे, गुप्त अंगों की रक्षा करे और अपने हाथ को दूसरें को दुख और कष्ट पहुंचाने से रोके, वह जन्नत में जाएगा।
)( घमंड से बचो। घमंड ही वह पाप है जिसने सबसे पहले शैतान को तबाह किया।
)( आपस में छल-कपट और बैर न रखो। डाह और ईष्र्या न करो, पीठ पीछे किसी की बुराई न करो। तुम सब भाई भाई हो।
)( शराब कभी न पियो।
)( जीव-जन्तुओं को अकारण मत मारो।
)( माता-पिता के साथ अच्छा व्यवहार करो। मां-बाप की ख़ुशी में ईश्वर की ख़ुशी है।
)( बाल-बच्चों की अच्छी देख भाल करो और उनको अच्छी शिक्षा दो।
)( किसी इन्सान को किसी पर कोई श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है। हां, वह इन्सान सर्वश्रेष्ठ है जिसके कर्म अच्छे हैं। चाहे उसका सम्बन्ध किसी भी देश अथवा सम्प्रदाय से हो।
)( ब्याज खाना और ब्याज का कारोबार हराम (अवैध) है।
)( नाप-तौल में कमी न करो।
)( सबके साथ न्याय करो, चाहे तुम्हारे रिश्तेदार हो या दुश्मन।
)( अगर कोई किसी इंसान को नाहक़ क़त्ल करता है तो मानो उसने सारे इंसानों की हत्या कर दी। और अगर कोई किसी इंसान की जान बचाता है तो मानो उसने सारे इंसानों को ज़िन्दगी बख्शी।
)( सफ़ाई सुथराई आधा ईमान है।
)( वह आदमी मुसलमान नहीं जो ख़ुद तो पेट भर खाए और उसका पड़ोसी भूखा रहे।
)( सारे इंसानों को मरने के बाद ख़ुदा के सामने हाजि़र होना है और अपने कर्मों का हिसाब देना है। यह दुनिया तो इम्तिहान की जगह है।
)( ख़ुदा इंसानों के मार्गदर्शन के लिए अपने पैग़म्बर भेजता रहा है और अन्त में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को अपना आख़िरी पैग़म्बर बनाकर भेजा है। रहती दुनिया तक सारे इंसानों के लिए ज़रूरी है कि हज़रत मुअम्मद (सल्ल.) का अनुसरण करें।
)( क़ुरआन अल्लाह की भेजी हुई किताब है जो हज़रत मुअम्मद (सल्ल.) के ज़रिये समस्त इंसानों की रहनुमाई के लिए भेजी गयी। इसमें पूरी ज़िन्दगी के लिए हिदायतें दी गई हैं।
)( जाति, रंग, भाषा, क्षेत्र, राष्ट्र, राष्ट्रीयता के आधर पर हिकसी के साथ ऊँच-नीच, छूतछात, भेदभाव और पक्षपात का व्यवहार न करो।
)( ग़लत तरीके से दूसरें का माल न खाओ। हलाल (वैध) कमाई करो।

वे क्या कहते है मुहम्मद (सल्ल०) के विषय में .....


1. Prof. Ram Krishna Rao:
 "मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के व्यक्तित्व की पूरी सच्चाई में उतर पाना सबसे कठिन हैं में केवल उसकी एक झलक ही पा सकता हूँ. सिनेमा के दृश्यों जैसा कैसा नाटकीय अनुक्रम हैं. ये मुहम्मद हैं, देवदूत-यह मुहम्मद, जनरल- ये मुहम्मद हैं, बिजनेसमैन- मुहम्मद, प्रचारक-मुहम्मद, दार्शनिक- मुहम्मद, व्यवस्थापक- मुहम्मद, सुवक्ता- मुहम्मद, सुधारक- मुहम्मद, अनाथो का सहारा- मुहम्मद, गुलामो का संरक्षक- मुहम्मद, स्त्रियों का उद्धारकर्ता- मुहम्मद, नियायधीश- मुहम्मद, संत और इन सभी प्रतापिमान मैदानों में, मानव गहमागहमी के इन सभी विभागों में वह एक हीरो के सामान है."
- The Prophet of Islam by Prof. Ram Krishna Rao, (then) head of the department of philosophy, Maharani Arts College for Women, crecent publishing co. IIIrd Edition, 1982- p17.

2. स्वामी विवेकानंद (विश्व-विख्यात धर्मविद्)
‘‘मुहम्मद (इन्सानी) बराबरी, इन्सानी भाईचारे और तमाम मुसलमानों के भाईचारे के पैग़म्बर थे। ...जैसे ही कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है पूरा इस्लाम बिना किसी भेदभाव के उसका खुली बाहों से स्वागत करता है, जबकि कोई दूसरा धर्म ऐसा नहीं करता। ...हमारा अनुभव है कि यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने इस (इन्सानी) बराबरी को दिन-प्रतिदिन के जीवन में व्यावहारिक स्तर पर बरता है तो वे इस्लाम और सिर्फ़ इस्लाम के अनुयायी हैं। ...मुहम्मद (सल्ल०) ने अपने जीवन-आचरण से यह बात सिद्ध कर दी कि मुसलमानों में भरपूर बराबरी और भाईचारा है। यहाँ वर्ण, नस्ल, रंग या लिंग (के भेद) का कोई प्रश्न ही नहीं। ...इसलिए हमारा पक्का विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की मदद लिए बिना वेदांती सिद्धांत—चाहे वे कितने ही उत्तम और अद्भुत हों—विशाल मानव-जाति के लिए मूल्यहीन (Valueless) हैं।’’
—‘टीचिंग्स ऑफ विवेकानंद, पृष्ठ-214, 215, 217, 218), अद्वैत आश्रम, कोलकाता-2004


3. स्वामी लक्ष्मिशंकराचार्ये: 
"मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पवित्र जीवनी पढने के बाद मैने पाया की आपने एकेश्वरवाद के सत्य को स्थापित करने के लिए अपार कष्ट झेले.
मक्का के काफिर सत्य धर्म की राह में रोड़ा डालने के लिए आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को तथा आपके सत्य मार्ग पर चलने वाले मुसलमानों को लगातार 13 सालो तक हर तरह से प्रताड़ित  व अपमानित करते रहे. इस घोर अत्याचार के बाद भी आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने धैर्य बनाये रखा. यहाँ तक की आपको अपना वतन छोड़ कर मदीना जाना पड़ा. लेकिन मक्का के मुशरिक कुरेश ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का व मुसलमानों का पीछा यहाँ भी नहीं छोड़ा. जब पानी सर से ऊपर हो गया तो अपनी व मुसलमानों की तथा सत्य की रक्षा के लिए मजबूर हो कर आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को लड़ना पड़ा इस तरह आप पर व मुसलमानों पर लड़ाई  थोपी गयी. 
इन्ही परिस्थितियों में सत्य की रक्षा के लिए जिहाद (यानी आत्मरक्षा व धर्म रक्षा के लिए धर्मयुद्ध) की आयते और अन्यायी तथा अत्याचारी काफ़िरो व मुशरिको को दंड देने वाली आयते अल्लाह की ओर से आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर आसमान से उतरी. 
पेयगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) द्वारा लड़ी गयी लडाईया आक्रमण के लिए न हो  कर, आक्रमण व आतंकवाद से बचाव के लिए थी, क्यूंकि अत्याचारियों के साथ ऐसा किये बिना शान्ति की स्थापना नहीं हो सकती थी. अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सत्य  तथा शान्ति के लिए अंतिम सीमा तक धैर्य रखा और धैर्य की अंतिम सीमा से युद्ध की शुरुआत होती है. इस प्रकार का युद्ध ही धर्म युद्ध कहलाता है. 
विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं की कुरेश जिन्होंने आप व मुसलमानों पर भयानक अत्याचार किये   थे, फ़तेह मक्का ( यानी मक्का विजय) के दिन वह थर-थर काँप रहे थे की आज क्या होगा? लेकिन आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)  ने उन्हें माफ़ कर गले लगा लिया.
पेयगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इस पवित्र जीवनी से सिद्ध  होता है की इस्लाम का अंतिम उद्देश्य दुनिया में सत्य और शान्ति स्थापना और आतंकवाद का विरोध है. 
अत: इस्लाम को हिंसा व आतंक से जोड़ना सबसे बड़ा असत्य है. यदि कोई ऐसी घटना होती है  तो उसको इस्लाम से या सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय से जोड़ा नहीं जा सकता."
- स्वामी लक्ष्मिशंकराचार्ये, 'इस्लाम आतंक या आदर्श', भाग 1 पेज 19-20

4. राजेन्द्र नारायण लाल (एम॰ ए॰ (इतिहास) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय):
‘‘...संसार के सब धर्मों में इस्लाम की एक विशेषता यह भी है कि इसके विरुद्ध जितना भ्रष्ट प्रचार हुआ किसी अन्य धर्म के विरुद्ध नहीं हुआ । सबसे पहले तो महाईशदूत मुहम्मद साहब की जाति कु़रैश ही ने इस्लाम का विरोध किया और अन्य कई साधनों के साथ भ्रष्ट प्रचार और अत्याचार का साधन अपनाया। यह भी इस्लाम की एक विशेषता ही है कि उसके विरुद्ध जितना प्रचार हुआ वह उतना ही फैलता और उन्नति करता गया तथा यह भी प्रमाण है—इस्लाम के ईश्वरीय सत्य-धर्म होने का। इस्लाम के विरुद्ध जितने प्रकार के प्रचार किए गए हैं और किए जाते हैं उनमें सबसे उग्र यह है कि इस्लाम तलवार के ज़ोर से फैला, यदि ऐसा नहीं है तो संसार में अनेक धर्मों के होते हुए इस्लाम चमत्कारी रूप से संसार में कैसे फैल गया? इस प्रश्न या शंका का संक्षिप्त उत्तर तो यह है कि जिस काल में इस्लाम का उदय हुआ उन धर्मों के आचरणहीन अनुयायियों ने धर्म को भी भ्रष्ट कर दिया था। अतः मानव कल्याण हेतु ईश्वर की इच्छा द्वारा इस्लाम सफल हुआ और संसार में फैला, इसका साक्षी इतिहास है...।’’
‘‘...इस्लाम को तलवार की शक्ति से प्रसारित होना बताने वाले (लोग) इस तथ्य से अवगत होंगे कि अरब मुसलमानों के ग़ैर-मुस्लिम विजेता तातारियों ने विजय के बाद विजित अरबों का इस्लाम धर्म स्वयं ही स्वीकार कर लिया। ऐसी विचित्र घटना कैसे घट गई? तलवार की शक्ति जो विजेताओं के पास थी वह इस्लाम से विजित क्यों हो गई...?’’
‘‘...मुसलमानों का अस्तित्व भारत के लिए वरदान ही सिद्ध हुआ। उत्तर और दक्षिण भारत की एकता का श्रेय मुस्लिम साम्राज्य, और केवल मुस्लिम साम्राज्य को ही प्राप्त है। मुसलमानों का समतावाद भी हिन्दुओं को प्रभावित किए बिना नहीं रहा। अधिकतर हिन्दू सुधारक जैसे रामानुज, रामानन्द, नानक, चैतन्य आदि मुस्लिम-भारत की ही देन है। भक्ति आन्दोलन जिसने कट्टरता को बहुत कुछ नियंत्रित किया, सिख धर्म और आर्य समाज जो एकेश्वरवादी और समतावादी हैं, इस्लाम ही के प्रभाव का परिणाम हैं। समता संबंधी और सामाजिक सुधार संबंधी सरकरी क़ानून जैसे अनिवार्य परिस्थिति में तलाक़ और पत्नी और पुत्री का सम्पत्ति में अधिकतर आदि इस्लाम प्रेरित ही हैं...।’’
— 
राजेन्द्र नारायण लाल (एम॰ ए॰ (इतिहास) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)
‘इस्लाम एक स्वयंसिद्ध ईश्वरीय जीवन व्यवस्था’
पृष्ठ 40,42,52 से उद्धृत, साहित्य सौरभ, नई दिल्ली, 2007 ई॰

Wednesday, 11 July 2012

अंतिम अवतार मुहम्मद सल्ल०. (उन पर ईश्वर की शान्ति हो):



1. अश्वरोहन एवं खड्ग्धारण- भगवतपुराण (12:02:19), द्वादश स्कंध द्वितीय अध्याय के उन्नीसवे श्लोक से कल्कि का देवताओ द्वारा दिए गए  अश्व (horse) पर चड़ना एवं तलवार द्वारा   दुष्टों का संहार करना उल्लिखित है. कल्कि का घोड़ा जो देवताओ द्वारा उन्हें दिया जायेगा बहुत उत्तम रहेगा, उसी पर चड़कर वो दुष्टों का संहार करेंगे. मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वास्सल्लम (उन  पर ईश्वर की शान्ति हो) को भी फरिश्तो द्वारा घोड़ा मिला था, जिसका नाम बुर्राक था, उस पर  बैठकर मुहम्मद सल्ल० ने रात्री को तीर्थ यात्रा की थी, मुहम्मद सल्ल० को घोड़े अधिक प्रिय थे. और उनके सात (7) घोड़े थे. अंतिम अवतार को  खड्ग्धारी बताया गया है दुष्टों का संहार अंतिम अवतार के द्वारा तलवार से है ना की एटम बम आदि से. विचारणिये है की ये समय अणुयुग है ना की तलवार का युग. तलवार का युग बीत चुका है. मुहम्मद सल्ल० के पास 9 तलवारे थी. अनस ने कहा की मेने मुहम्मद सल्ल० को देखा की घोड़े पर सवार थे और गले में तलवार लटकाए हुए थे (बुखारी).

2. जगद्गुरु -  भगवतपुराण में अंतिम अवतार को जगद्पती कहा गया है (भगवतपुराण, द्वादश स्कंध, द्वितीय अध्याय, उन्नीसवा श्लोक) जगत का अर्थ है 'संसार' और पति का अर्थ है 'रक्षक'. जगतपति शब्द का अर्थ हुआ की अपने उपदेशो द्वारा गिरते हुए समाज को बचाने वाला. वो समाज कोई सीमित समाज तो है नहीं, वो समाज है संसार. तात्पर्य ये हुआ की जगत का गुरु मुहम्मद सल्ल० के लिये भी कुरान में कहा गया है ऐ मुहम्मद (सल्ल०),! एलान कर दो सारी दुनिया भर के लिये नबी हो कर तुम आये हो.- कुरान 7:158. दूसरी जगह ये भी कहा गया है, की 'पवित्र है वो अस्तित्व, जिसने अपने भक्त पर पवित्र ग्रन्थ उतारा, ताकि सम्पूर्ण संसार के लिये वो पापो का डर दिखाने वाला हो' - कुरान 25:1.
इस प्रकार जगतगुरू का अस्तित्व एवं महत्व दोनों ही सिद्ध होते हैं.

3. असाधुदमन - कल्कि के विषय में उल्लेख है की वो दुष्टों का दमन करेंगे (भगवतपुराण  00:02:19). यही यही बात मुहम्मद सल्ल० पर भी घटित होती है. उन्होंने भी दमन किया, तो दुष्टों का ही. कुरान में यह भी कहा गया है, की जिनको सताया गया है, उनको आज्ञा दी जाती है की वे भी लड़ें, इस कारण से की उन पर अत्याचार किया गया है और परमेश्वर उनकी सहायता पर पुरी शक्ति  रखता है. जो लोग अपने घरों से निकाले गए केवल इस बात पर की ईश्वर उनका पालक है. मुहम्मद सल्ल० ने लुटेरो और डाकुओं को सुधार कर उन्हें एकेश्वरवाद की शिक्षा दी, तथा ईश्वर की पूजा में  और देवताओ के मिश्रण का विरोध किया तथा मूर्तिपूजा का भी खंडन किया. उन्होंने जिस धर्म की स्थापना की, उसके विषय में कहा की में प्राचीन धर्म को ही स्थापित कर रहा हूं, कोई यह नया धर्म नहीं है. इस्लाम शब्द का अर्थ है, ईश्वर की आज्ञा का पालन कराने वाला धर्म और वेद शब्द भी ईश्वर्ये वाणी हैं और उनकी आज्ञा पालन कराने वाला धर्म वैदिक धर्म है, अता वैदिक या इस्लाम धर्म और वैदिक धर्म में साम्य है. जो वैदिक या इस्लाम धर्म के मार्ग में बाधक है उन्हें नास्तिक या काफिर कहा जाता है, उनसे विरोध की बात और उनके दमन की बात स्वभाविक है.
जिस परिस्थिति में मुहम्मद सल्ल० का जन्म हुआ, वो परिस्थिति डाकुओं और दुष्टों से युक्त थी. लड़कियों को कत्ल कर दिया जाता था.
उनके जन्म के पहले इरान तो कुबाद प्रथम बादशाह था, जो भज्दक के उपदेश से प्रभावित हो कर ये घोषित कर चुका था की धन और औरत सभी की है, उन पर किसी व्यक्ति विशेष का अधिकार नही. इसी के परिणाम स्वरूप व्यभिचार अपनी सीमा को पार कर चुका था. बाद में मुहम्मद सल्ल० ही ऐसे व्यक्ति हुए थे जिनके वर्ग ने उन आत्ताय्यों को पराजित करके धर्म की मर्यादा स्थापित करने में सफलता प्राप्त की.

4. स्थान सम्बन्धी साम्य - कल्कि का स्थान शम्भल (भगवतपुराण  12:02:18) होगा और वो वहाँ के   पुरोहित के यहाँ जन्म लेंगे. पुरोहित का नाम विष्णुयश होगा. इतना जो ज्ञात है की उक्त नाम संस्कृत भाषा के हैं, जो या तो अर्थ को निर्धारित करके लिखे गए हैं, या तो उन नामो का विकृत रूप  हो गया है.
  संस्कृत प्राय: अर्थप्रधान नामों को महत्व देता है, अतएव उन नामों के अर्थ को ही स्वीकार करना  अधिक उपयुक्त है.
'शम्भल'  शब्द शांत करना अर्थ वाली 'शम' धातु से बना हुआ है, जिसमे बन प्रत्ये लगा हुआ है. शम्भल शब्द का अर्थ होगा 'शान्ति का घर' और मक्का को अरबी भाषा में 'दारुल अमन''भी कहा जाता है, जिसका अर्थ 'शान्ति का घर' है.

5. प्रधान पुरोहित के यहाँ जन्म- कल्कि के विषय में यह कहा गया है की वो प्रधान पुरोहित के यहाँ  जन्म लेंगे. मुहम्मद सल्ल० ने भी मक्का में काबा के प्रधान पुरोहित के यहाँ जन्म लिया.

6. माता-पिता सम्बन्धी साम्य- कल्कि की माता का नाम कल्किपुराण में सुमति आया हुआ है जिसका अर्थ है, शान्ति एवं मंशील स्वभाव वाली. पिता का नाम विष्णुयश आया हुआ है, जो बहुत ही पवित्र तथा ईश्वर का उपासक होगा, मुहम्मद सल्ल० की माता का भी नाम आमिना था जिसका अर्थ होता है, शान्ति (अमन) वाली, तथा पिता का नाम 'अब्दुल्लाह' था. अब्दुल्ला का अर्थ है अल्लाह अर्थात विष्णु का बंदा (भक्त).


7. अंतिम अवतार की धारणा में साम्य- कल्कि को अंतिम युग का अंतिम अवतार बताया गया है (भगवतपुराण  प्रथम स्कंध, तृतीय अध्याय, पच्चीसवा (25) श्लोक). मुहम्मद ने भी घोषणा की है की में अंतिम संदेष्टा हूं. यही करण है की मुसलमान भावी किसी संदेष्टा या अवतार को नही मानते.
'कल्कि' शब्द का अर्थ 'वाचस्पत्यम' तथा 'शब्द्कल्प्तारू' में अनार का फल खाने वाला तथा कलंक को धोने वाला किया गया है. मुहम्मद सल्ल० भी अनार और खजूर का फल खाते थे, तथा उन्होंने प्राचीन  काल से आगत मिश्रण (शिर्क) और नास्तिकता (कुफ्र) को धो दिया.

8. उत्तरदिशीगमन तथा उपदेश सम्बन्धी साम्य- कल्कि पुराण में उल्लिखित है, की कल्कि पैदा  होने के बाद पहाड़ी की तरफ चले जाएंगे और वहा परशुराम जी से ज्ञान प्राप्त करेंगे बाद में उत्तर की तरफ जाकर फिर लोटेंगे. मुहम्मद सल्ल० भी जन्म के कुछ समय बाद पहाड़ियों की तरफ चले गए और वहाँ जिब्रील (अलैह०) द्वारा ज्ञान प्राप्त किया, अर्थात उन पर कुरान की आयतों का उतरना शुरू हुआ. उसके बाद वो उत्तर मदीने जाकर वहाँ से फिर दक्षिण की ओर लोट आए और अपने स्थान को विजित किया, यही घटना कल्कि के विषय में भी घटने की पुरानो द्वारा घोषणा हैं.

9. जन्मतिथि सम्बन्धी साम्य- कल्किपुराण में कल्कि के जन्म की तिथि के संबंध में लिखा है की माधव मास में शुक्ल पक्ष द्वादशी को जन्म होगा (कल्किपुराण अध्याय 2, श्लोक 15) और मुहम्मद सल्ल० का जन्म भी 12 रबी उल अव्वल को हुआ था. 12 रबी उल अव्वल का अर्थ है, चान्द की (12) बारहवी तिथि अर्थात शुक्लपक्ष द्वादशी.

Saturday, 7 July 2012

मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अंतिम दूत (आखरी पैग़म्बर) विभिन्न धर्मों में:

वेदों ने अपने एक महान दूत का नाम अग्नि बताया था:
"हम अग्नि को दूत (पैग़म्बर) चुनते है"
-ऋग्वेद 01:12:01
यहाँ अग्नि से मतलब आग नही बल्कि मनुष्य (इनसान) है, ऋग्वेद (01:31:15) में अग्नि को साफ़-साफ़ 'नर' यानि मनुष्य (इनसान) बताया गया है. फिर ऋग्वेद (03:29:11) में कहा गया है की अग्नि का एक नाम 'नराशंस' है वो नराशंस नाम से ही दुनिया में आयेंगे. शब्द 'नराशंस' का अनुवाद प्रशंसा योग्य मनुष्य या "मुहम्मद" होता है. फिर अर्थर्ववेद (20:127:1-3) में साफ़-साफ़ कह दिया गया कि नराशंस के आने पर उनकी बहुत प्रशंसा होगी, ऊंट उनकी सवारी होगी, उनकी कई पत्नियाँ होंगी. फिर उस वक्त के मक्के की आबादी 60,090 होना, अलंकृत राजभाषा में हबशा (इथियोपिया) मुल्क में पनाह लेने वालो की संख्या 100 होना, 10 जन्नती (अशरा मुबश्शिरा) सहाबा का इशारा, बदर जंग में फ़तह हो कर लोटने वालो की संख्या 300 और मक्के की फ़तह के वक्त इस्लामी सेना की संख्या 10,000 का भी ज़िक्र किया गया है. वेद मंत्रो का यह अनुवाद प्राचीन अनुवादको पंडित राजाराम और पंडित खेमकरण के अनुवादों पर आधारित है. चंडीगढ़ विश्वविध्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर पंडित वेद प्रकाश उपाध्याय ने ये सारी वियाख्या बहुत साफ़ शब्दों में लिखी है.

वेदों ने अपने अवतरण काल के बहुत बाद 'नराशंस' नाम के एक दूत (पैग़म्बर) के आने की भविष्यवाणी की थी और वेद लाने वाले अज्ञात ऋषि (नबी) को आखिरी नहीं कहा गया था. गीता (04:07) और श्रीमद भागवत महापुराण (09:24:56) में यह धारणा अंकित है की जब-जब दुनिया में धर्म बिगाड़ पैदा हो जाता है और बुराईया बढ़ जाती है तब अवतार दुनिया में आते हैं पोराणिक काल के ग्रंथो में दूत के बजाये अवतार की धारणा हैं.

यहूदियों की मोजुदा तोरेत और इसाइयों की मोजूदा इन्जीलो में भी हज़रत मूसा और हज़रत ईसा को आखिरी दूत (पैग़म्बर) नहीं कहा गया है. दोनों में साफ़ तरीके से बाद के किसी दौर में आने वाले एक दूत के आने के संकेत दिए गए हैं. से. इंजील में इनको Paraclete या Periclytos कहा गया है जिसका अनुवाद हैं "प्रशंसा योग्य" या फिर "मुहम्मद".

गौतम बुद्ध ने भी स्वयं को अंतिम "बुद्ध" नहीं कहा था. जब बुद्ध के शिष्य आनंद ने सवाल किया, "आपके जाने के बाद कौन मार्गदर्शन करेगा" बुद्ध ने जवाब दिया, "में दुनिया में आने वाला न तो पहला बुद्ध हूँ और न अंतिम होऊंगा. अपने समय में दुनिया में एक और बुद्ध आएगा वो पवित्र, बहुत बुद्धिमान होंगे. अच्छी ज़िंदगी का जानने वाला, इंसानियत का अनोखा नेता (नेता), फरिश्तो और अनित्ये मनुष्यों का गुरु होगा. मेने जो सत्य बाते तुम्हे बताई है वो तुम्हे बताएगा. वो ऐसे धर्म का प्रचार करेगा जिसका आरम्भ भी रोशन होगा मध्य भी रोशन होगा और अंत भी रोशन होगा. वो ऐसी मज़हबी ज़िंदगी बसर करेगा जो पूर्ण और पवित्र होगी, जैसा की मेरा ढंग है. उसके शिष्य हजारो होंगे जबकि मेरे सेकड़ो ही हैं. आनंद ने पूछा, "हम उसे कैसे पहचानेंगे?" बुद्ध ने जवाब दिया "वो मेत्रिये (कृपा करने वाले) के नाम से जाना जायेगा ...."

ग़ौर करे की गौतम बुद्ध ने भी अपने आपको अंतिम नहीं कहा बल्कि बाद के किसी दौर में आने वाले मेत्रेये (कृपालु) की भविष्यवाणी कि थी. ये सुन लें कि क़ुरान में हज़रत मुहम्मद सल्ल्ल० "रेह्मतुल्लिल आलमीन" (सभी संसारो के लिये कृपा) कहा गया है. पारसियों के दूत ज़र्थ्रूस्त्र के बारे में उनके पवित्र ग्रन्थ अवेस्ता में लिखा हैं की ईश्वर ने कहा जैसे ज़र्थ्रूस्त्र के रास्ते बराबर चलकर उसके मानने वाले वैभव की छोटी पर पहुचे इसी तरह भविष्य में एक वक्त में ईश्वर मैं मानने वाली एक कौम होगी जो दुनिया और उसके धर्मो को एक नयी ज़िंदगी देगी और जो पैग़म्बर की मदद के लिये खतरनाक युद्धों में खड़ी होगी. आगे दूत (पैग़म्बर) का नाम बताते हुए कहा, "जिसका नाम Vijaye Soeshyant होगा और जिसका नाम Astvat - Ereta होगा वो Soeshyaant (कृपा) होगा क्योंकि सारी दुनिया को उससे फायदा पहुचेगा और वो Astvat Ereta (जगाने वाला) होगा क्योंकि ज़िदा इंसान के रूप में वो इंसानों कि उस तबाही के खिलाफ खड़ा होगा जो मूर्ति पूजको और मज्दानियो की बुराईयों से फेलेगा .
(Farvardin Yasht, 25-29, Quoted by A.H. Vidyarthi in Mohammad in Parsi Scriptures P:18)

इस्लाम में अंतिम (पैग़म्बर) के दूत की धारणा के सिवा तमाम धर्मों में सिर्फ जैन धर्म के मानने तो धारणा रखते है की श्री महावीर अंतिम तीर्थकर थे लेकिन वह भी ये दावा सिर्फ जैनियों का है, स्वयं श्री महावीर के अपने शब्दों में उनके अंतिम होने का दावा हमें नहीं मिलता है.
इस्लाम दुनिया का ऐसा अकेला धर्म है जिसको पूर्ण करने वाले मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अंतिम दूत (पैग़म्बर) का ऐलान किया.
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सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम = उन पर ईश्वर ओर से शान्ति हो

Monday, 25 June 2012

कुरान में इंसान के चंद्रमा पर पहुँचने का वर्णन :


"हे जिनों और इंसानों की टोलियों! अगर तुम समझते हो की आसमान और पृथ्वी के वियासो (Diameters) * में से गुज़र कर पार निकल सकते हो तो ऐसा कर देखो अतिरिक्त बल के इस्तेमाल के बिना नहीं कर सकोगे. अब तुम अपने रब के किन-किन वरदानो को झूट्लाये जाओगे "
 - कुरान 55:33-34

 शक्ति और वेग के नियमो पर आधारित उपकरणों की सहायता से एक दिन पृथ्वी और अन्य ग्रहों  के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में से गुज़रना के सम्भव होगा, ये संकेत कुरान कर चूका था. उस काल में जो वाहन मौजूद थे उनके अतिरिक्त अन्य वाहनों की खोज होगी, ये भी कुरान ने बता दिया था -
 "अल्लाह ने घोड़े, खच्चर, गधे तुम्हारे वाहन और शोभा के लिये पैदा किए और वो (इनके अलावा ऐसे वाहन) पैदा करेगा जिनका तुम्हे अभी ज्ञान नही है."
- कुरान 16:8-9

 इन वाहनों पर सवार हो कर चंद्रमा पर पहुँचने का वर्णन देखिए -
"पूर्ण हो जाने वाला चंद्रमा गवाह है की तुम ज़रूर इस धरती से दूसरी धरती तक सवारी पर सवार हो कर जाओगे. (ये चमत्कार देख लेने के बाद) फिर इन्हें अब क्या हो गया की ईमान नहीं लाते. "
- कुरान 84:18-20

और ध्यान देने वाली एक बात और है की कुरान में चंद्रमा की जो सुरह (अध्याय) है सुरह क़मर (चंद्रमा) उसकी पहली आयत (मन्त्र) से ले कर कुरान की आखिरी सुरह 'सुरह नास' की आखिरी आयत तक जितनी आयते है उनकी संख्या 1389 बनती है और यही वो इस्लामी साल 1389 हिजरी (रोमन साल 1969) था जिस वर्ष नील आर्मस्ट्रांग चंद्रमा पहुंचा था. '
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* संकेत है, गुरुत्वाकर्षण की सीमा की ओर और पृथ्वी और अन्य ग्रहों के गोल होने तरफ भी.
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Wednesday, 7 March 2012

हिंदू धर्म में एकेश्वरवाद


1. सिर्फ एक ईश्वर है उसी की इबादत (उपासना) करो.
- ऋग्वेद 6:45:16

2. वो (ईश्वर) एक है उसका कोई साझी नहीं है.
- छान्दोग्य उपनिषद 6:02:01

3. जो असम्भूति अर्थात प्रकृति रूप से जड़ पदार्थ  (अग्नि, मिट्टी, वायु आदि)  की उपासना करते हैं, वह अज्ञान के अन्धकार में प्रविष्ट होते हैं और जो 'सम्भूति' अर्थात प्रकृति पदार्थो के परिणामस्वरूप सृष्टि (तख़्त, तस्वीर, मूर्तियाँ आदि) में रमन करते हैं वह उससे भी अधिक अन्धकार में पड़ते हैं.
- यजुर्वेद 40:9

4. ज्ञानी लोग एक ईश्वर को अलग-अलग नामो से पुकारते है.
- ऋग्वेद 1:164:46

5. उसकी कोई प्रतिमा नहीं है उसका नाम ही अत्यंत महान है, सबसे बड़ा यश यही है.
- यजुर्वेद 32:3

6. वो एक है लेकिन बुद्धिमान लोग उसे विभिन्न नामो से पुकारते है जैसे- इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्या, प्रकाशपुंज, सुपर्णा (संसार की सुरक्षा और इसकी देखभाल करने वाला) इत्यादि उसका कार्य बिलकुल ठीक-ठीक होता है.
- ऋग्वेद 1:22:164

7. मेरे परम भाव को न जानने वाले मुर्ख लोग मुझ सम्पूर्ण भूतो के महान ईश्वर को शरीरधारी समझ कर मेरा अपमान करते हैं.
- गीता 9:11

8. वो शरीरविहीन (bodyless) और पाक है.
- यजुर्वेद 40:8

9. उसके सिवा किसी की उपासना ना करो वही खुदा है उसी की तारीफ करो.
- ऋग्वेद 8:01:01

10. मिट्टी पत्थर आदि की मूर्तियाँ देव नही होती है.
- श्रीमद भागवत महापुराण 10:84:11

11. सिर्फ वोह एक ही स्वयं से (बिना किसी के जन्म दिए) अकेला विधमान है.
- अर्थर्ववेद 13:04:12

13. एक ईश्वर ही पूजा के योग्य और सभी प्रजातियों में स्तुति के योग्य है.
- अर्थर्ववेद 2:02:01